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घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

अल्लाह के नबी का फ़रमान है पड़ोसियों से अच्छा व्यव्हार रखो ताकि मुसलमान कहलाओ

अबनाः इमाम जाफर सादिक़ अ.स. ने अपने शिष्यो द्बारा अपने शियों को कुछ वसीयतें फरमाई , जिन मे से कुछ निम्नलिखित हैं । 
1.ज़ैद इब्ने शह्हाम का बयान है कि मुझ से इमाम सादिक़ अ.स. ने फ़रमाया, तुम्हारी निगाह में जो भी मेरी पैरवी करने वाला और मेरे बारे में बातें करने वाला है उसको मेरा सलाम कहना, मैं तुम सभी को तक़वा और परहेज़गारी अपनाने, अल्लाह के लिए काम करने, सच बोलने, अमानतदारी को बाक़ी रखने, अधिक से अधिक सज्दे करने और पड़ोसियों से अच्छा रवैया अपनाने की वसीयत करता हूँ, क्योंकि पैग़म्बर यही शिक्षा और संस्कार ले कर आए थे। जिन लोगों ने तुम को अमानतदार समझ कर अपना माल तुम्हारे पास रखवाया वह अच्छे लोग हों या बुरे, उनकी अमानत को उसी प्रकार वापिस कर दो, क्योंकि अल्लाह के नबी का फ़रमान है कि सुई धागा भी अगर हो उसको भी वापिस करो। अपने घर वालों और रिश्तेदारों के साथ नेकी करो, उनमें से अगर किसी को देहांत हो जाए तो जनाज़े में शामिल हो, जब वह बीमार हों उन्हें देखने जाओ, उनका हक़ अदा करते रहो, अगर तुम में से कोई इस प्रकार जीवन बिताता है तो उसे परहेज़गार और अच्छी नैतिकता वाला इंसान कहा जाएगा, और लोग उसको जाफ़री यानी इमाम सादिक़ का मानने वाला कहेंगे, और मुझे भी बहुत ख़ुशी होगी, और अगर कोई ख़ियानत करे या दुर्व्यवहार करे और इन बातों पर अमल न करे तो कहा जाएगा क्या यह इमाम सादिक़ का मानने वाला है, और यही नैतिक गुण और संस्कार उन्होंने सिखाए हैं? (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 636) 
2. ऐ नोमान के बेटे हठधर्मी से बचो, क्योंकि यह अमल को नष्ट कर देता है, और झगड़ालू व्यवहार के कारण जीवन बर्बाद मत करो क्योंकि अल्लाह से दूर कर देता है, पहले के लोगों के जीवन को देखो वह किस प्रकार चुपचाप जीवन बिताने का प्रयास करते थे और तुम लोग अधिक बोलने का प्रयास करते हो। पुराने ज़माने में लोग अल्लाह की अधिक इबादत के लिए दस साल तक चुप रहने का प्रयास करते थे, और अगर वह इस प्रयास में कामयाब हो गए तभी अपने आप को अल्लाह की इबादत करने वाला समझते थे वरना कहते थे कहाँ हम कहाँ अल्लाह की इबादत, वह कहा करते थे, जो भी गुनाह से बचेगा, और बुरी बातों से अपनी ज़ुबान को पाक रखेगा और मुसीबत के समय सहन करेगा वही कामयाब होगा। यही लोग अल्लाह के चुने हुए उसके ख़ास बंदे और सच्चे मोमिन हैं, और ख़ुदा की क़सम अगर तुम में कोई सोने से भरी ज़मीन के बराबर नेकी करे लेकिन किसी मोमिन भाई से हसद और जलन करने लगे तो अल्लाह उसे उसी सोने से उसके बदन को पिघला कर उसकी सज़ा देगा। ऐ नोमान के बेटे, अगर किसी से किसी चीज़ के बारे सवाल किया जाए और वह थोड़ा जवाब भी जानते हुए यह कह दे कि वह इस बारे में कुछ नहीं जानता, तो उसने इल्म के साथ इंसाफ़ नहीं किया। (उसूले काफ़ी, जिल्द 8, पेज 288) 
3.ऐ हमरान, जीवन में अपने से पैसे में मज़बूत लोगों की जगह अपने से कमज़ोर को देखो तभी जीवन में क़नाअत कर सकोगे, और अपने जीवन से राज़ी रहोगे, और इसके बदले अल्लाह बेहतर अज्र भी देगा। और जान लो, अल्लाह पर यक़ीन और भरोसा करते हुए कम अमल और इबादत, यक़ीन और भरोसे के बिना की गई अधिक इबादत से ज़्यादा क़ीमती है, और यह भी जान लो, हराम कामों से बचने, मोमिन को तकलीफ़ न देने और उसकी ग़ीबत न करने से बेहतर परहेज़गारी नहीं है, और अच्छे अख़लाक़ से बेहतर कोई जीवन नहीं, क़नाअत से बेहतर कोई दौलत नहीं और घमंड से हानिकारक कोई जेहालत नहीं है। (उसूले काफ़ी, जिल्द 8, पेज 244) 
4. मैं अपने आपको और तुमको तक़वा और अल्लाह की पैरवी करने की नसीहत करता हूँ, क्योंकि अल्लाह की पैरवी, तक़वा, विनम्रता, उसके हुक्म की पैरवी, उसके रसूलों का साथ देना, ख़ुदा की मर्ज़ी हासिल करने की हमेशा कोशिश करना और गुनाहों से बचना यह सब तक़वा द्वारा ही संभव है, बेशक जिस ने जीवन में तक़वा अपना लिया, उसने अल्लाह की मर्ज़ी से अपने को जहन्नम की आग से दूर कर लिया और दुनिया और आख़िरत की हर अच्छाई को अपने नाम कर लिया, और जिसने दूसरों को जीवन में तक़वा अपनाने की नसीहत की समझो उसने सबसे अच्छी नसीहत की, अल्लाह अपनी दया करते हुए हम सबको मुत्तक़ीन में शुमार करे। (बसाएरुद् दराजात, पेज 526) 
5. तुम में सब से बेहतर सख़ावत करने वाला है, और सब से बेकार कंजूस है, सर्वश्रेष्ठ कामों में से मोमिन भाईयों के साथ नेकी करना और उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना है, क्योंकि इस काम से शैतान अपमानित होता है, और इंसान जहन्नम की आग से बच कर जन्नत तक पहुँच जाता है। और ऐ जमील मेरी यह बात अपने नेक साथियों तक पहुँचा देना। जमील ने पूछा, मेरी जान आप पर क़ुर्बान, मेरे नेक साथी कौन लोग हैं? इमाम ने फ़रमाया, वह लोग जो सुख और दुख दोनों में अपने मोमिन भाई के साथ नेकी करता है, और ऐ जमील यह काम दौलतमंदों के लिए आसान है। (ख़ेसाले सदूक़, पेज 96) 

6.सुफ़यान सौरी कहते हैं कि एक बार इमाम से मुलाक़ात के लिए गया, और उन से नसीहत करने का आग्रह किया। इमाम ने फ़रमाया, ऐ सुफ़यान, झूठा इंसान कभी उदारता और भरोसे के क़ाबिल नही हो सकता, सुस्त इंसान कभी किसी को दोस्त नहीं बना सकता, हसद और जलन रखने वाला आराम नहीं पा सकता, और बुरा व्यव्हार करने वाला कभी बड़ा नहीं कहला सकता। सुफ़यान ने फ़िर कहा कि मौला कुछ और, इमाम ने फ़रमाया ऐ सुफ़यान, अल्लाह पर हमेशा ईमान रखो ताकि सच्चे मोमिन कहलाओ, उस के दिए हुए पर राज़ी रहो ताकि किसी के मोहताज न कहलाओ, पड़ोसियों से अच्छा व्यव्हार रखो ताकि मुसलमान कहलाओ, और कभी खुले आम गुनाह करने वालों से दोस्ती न रखो ताकि तुम उसके गुनाह से बचे रहो, और हमेशा जीवन में उन लोगों से मशविरा करो जिनके दिल में अल्लाह का डर हो। (बिहारुल अनवार, जिल्द 78, पेज 192) 

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