Skip to main content

घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

वाजिब नमाज़े आयात पढने का तरीका पढ़े !

1516। नमाज़े आयात की दो रकअतें हैं और हर रकअत में पाँच रुकूअ हैं। इस के पढ़ने का तरीक़ा यह है कि नियत करने के बाद इंसान तकबीर कहे और एक दफ़ा अलहम्द और एक पूरा सूरह पढ़े और रुकूअ में जाए और फिर रुकूअ से सर उठाए फिर दोबारा एक दफ़ा अलहम्द और एक सूरह पढ़े और फिर रुकूअ में जाए। इस अमल को पांच दफ़ा अंजाम दे और पांचवें रुकूअ से क़्याम की हालत में आने के बाद दो सज्दे बजा लाए और फिर उठ खड़ा हो और पहली रकअत की तरह दूसरी रकअत बजा लाए और तशह्हुद और सलाम पढ़ कर नमाज़ तमाम करे।

1517। नमाज़े आयात में यह भी मुम्किन है कि इंसान नियत करने और तकबीर और अलहम्द पढ़ने के बाद एक सूरह की आयतों के पांच हिस्से करे और एक आयत या उस से कुछ ज़्यादा पढ़े और बल्कि एक आयत से कम भी पढ़ सकता है लेकिन एहतियात की बिना पर ज़रुरी है कि मुकम्मल जुमला हो और उस के बाद रुकूअ में जाए और फिर खड़ा हो जाए और अलहम्द पढ़े बग़ैर उसी सूरह का दूसरा हिस्सा पढ़े और रुकूअ में जाए और इसी तरह इस अमल को दोहराता रहे यहां तक कि पांचवें रुकूअ से पहले सूरे को ख़त्म कर दे मसलन सूरए फ़लक़ में पहले बिसमिल्ला हिर्रहमानिर्रहीम। क़ुल अऊज़ू बिरब्बिलफ़लक़। पढ़े और रुकूअ में जाए उस के बाद खड़ा हो और पढ़े मिन शर्रे मा ख़लक़। और दोबारा रुकूअ में जाए और रुकूअ के बाद खड़ा हो और पढ़े। व मिन शर्रे ग़ासेक़िन इज़ा वक़ब। फिर रुकूअ में जाए और फिर खड़ा हो और पढ़े व मिन शर्रिन्नफ़्फ़साति फ़िल उक़द और रुकूअ में चला जाए और फर खड़ा हो जाए और पढ़े व मिन शर्रि हासिदिन इज़ा हसद। और उस के बाद पांचवें रुकूअ में जाए और (रुकूअ से) खड़ा होने के बाद दो सज्दे करे और दूसरी रकअत भी पहली रकअत की तरह बजा लाए और उस के दूसरे सज्दे के बाद तशह्हुद और सलाम पढ़े। और यह भी जाएज़ है कि सूरे को पांच से कम हिस्सों में तक़सीम करे लेकिन जिस वक़्त भी सूरह ख़त्म करे लाज़िम है कि बाद वाले रुकूअ से पहले अलहमद पढ़े।

1518। अगर कोई शख़्स नमाज़े आयात की एक रकअत में पांच दफ़ा अलहम्द और सूरह पढ़े और दूसरी रकअत में एक दफ़ा अलहम्द पढ़े और सूरे को पाँच हिस्सों में तक़सीम कर दे तो कोई हरज नहीं है।

1519। जो चीज़ें यौमिया नमाज़ में वाजिब और मुस्तहब हैं अलबत्ता अगर नमाज़े आयात जमाअत के साथ हो रही हो तो अज़ान और अक़ामत की बजाए तीन दफ़ा बतौर रजा "अस्सलात" कहा जाए लेकिन अगर यह नमाज़ जमाअत के साथ न पढ़ी जा रही हो तो कुछ कहने की ज़रुरत नहीं।

1520। नमाज़े आयात पढ़ने वाले के लिए मुस्तहब है कि रुकूअ से पहले और उस के बाद तकबीर कहे और पांचवीं और दसवीं रुकूअ के बाद तकबीर से पहले "समे अल्लाहु लेमन हमिदह" भी कहे।

1521। दूसरे, चौथे, छठे, आठ्वें और दस्वें रुकूअ से पहले क़ुनूत पढ़ना मुस्तहब है और अगर क़ुनूत सिर्फ़ दस्वें रुकूअ से पहले पढ़ लिया जाए तब भी काफ़ी है।

1522। अगर कोई शख़्स नमाज़े आयात में शक करे कि कितनी रकअतें पढ़ी हैं और किसी नतीजे पर न पहुंच सके तो उस की नमाज़ बातिल है।

1523। अगर (कोई शख़्स जो नमाज़े आयात पढ़ रहा हो) शक करे कि वह पहली रकअत के आख़िरी रुकूअ में है या दूसरी रकअत के पहले रुकूअ में और किसी नतीजे पर न पहुंच सके तो उस की नमाज़ बातिल है लेकिन अगर मिसाल के तौर पर शक करे कि चार रुकूअ बजा लाया है या पाँच और उस का यह शक सज्दे में जाने से पहले हो तो जिस रुकूअ के बारे में उसे शक हो कि बजा लाया है या नहीं उसे अदा करना ज़रुरी है लेकिन अगर सज्दे के लिए झुक गया हो तो ज़रुरी है कि अपने शक की परवा न करे।
1524। नमाज़े आयात का हर रुकूअ रुक्न है और अगर उन में अमदन कमी या बेशी हो जाए तो नमाज़ बातिल है। और यही हुक्म है अगर सहवन कमी हो या एहतियात की बिना पर ज़्यादा हो। 



Comments

Popular posts from this blog

नियोग प्रथा पर मौन, हलाला 3 तलाक पर आपत्ति ? एक बार जरुर पढ़े

3 तलाक एवं हलाला पर आपत्ति जताने वाले आखिर नियोग प्रथा पर खामोश क्यों हैं, हलाला ठीक है या ग़लत कम से कम विवाहित महिला शारीरिक संबंध अपने पति से ही बनाती है! पर नियोग प्रथा से संतान सुख के लिए किसी भी ब्राह्मण पुरुष से नियोग प्रथा के अनुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकती है! यह कितना बड़ा अत्याचार और पाप हुआ? नियोग प्रथा क्या है? हिन्दू धर्म में एक रस्म है जिसे नियोग कहते है , इस प्रथा के अनुसार किसी विवाहित महिला को बच्चे पैदा न हो रहे हो तो वो किसी भी ब्राह्मण पुरुष से नियोग प्रथा के अनुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकती है! नियोग प्रथा के नियम हैं:- १. कोई भी महिला इस प्रथा का पालन केवल संतान प्राप्ति के लिए करेगी न कि आनंद के लिए। २. नियुक्त पुरुष केवल धर्म के पालन के लिए इस प्रथा को निभाएगा। उसका धर्म यही होगा कि वह उस औरत को संतान प्राप्ति करने में मदद कर रहा है। ३. इस प्रथा से जन्मा बच्चा वैध होगा और विधिक रूप से बच्चा पति-पत्नी का होगा , नियुक्त व्यक्ति का नहीं। ४. नियुक्त पुरुष उस बच्चे के पिता होने का अधिकार नहीं मांगेगा और भविष्य में बच्चे से कोई रिश्ता नहीं रखेगा। ...

घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

बोको हराम आतंकवादियों के हमले में नाइजीरिया के शिया स्कूल में तीन मुसलमानों की हत्या

  तीन शिया मुसलमानों की हत्या उस समय कर दी गई जब संदिग्ध बोको हराम तकफिरी आतंकवादियों ने यॉबे राज्य के गाइडम स्थानीय सरकार क्षेत्र में फुदैया इस्लामिक स्कूल पर हमला किया। इन आतंकवादियों ने शुक्रवार को स्कूल पर हमला किया, जहां शिया समुदाय आमतौर पर धार्मिक गतिविधियाँ करता है।  आतंकवादियों ने पहले हवा में गोलीबारी की और फिर मोहम्मद सालेह, अहमद अब्दुलरहमान, और अब्दुल्लाही आदम की हत्या कर दी। एक और पीड़ित को, जो हमले में बच गया था, इलाज के लिए एनगुरू शहर के अस्पताल में ले जाया गया।  नाइजीरिया में शिया मुसलमानों को बोको हराम आतंकवादियों द्वारा गंभीर रूप से निशाना बनाया गया है। 2014 में, बोको हराम के आत्मघाती हमलावर ने यॉबे राज्य के पोटिसकुम शहर में एक शिया धार्मिक समारोह में 15 उपासकों की हत्या कर दी थी।

आजादी के आंदोलन में दारुल उलूम देवबंद का योगदान - तहरीक रेशमी रुमाल आंदोलन

देवबंद (सहारनपुर)। देश की आजादी की लड़ाई में विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक संस्था दारुल उलूम देवबंद ने भी अहम भूमिका निभाई। दारुल उलूम के छात्र मौलाना महमूदुल हसन ने रेशमी रुमाल तहरीक चलाकर आजादी की लड़ाई को नई धार दी। इस आंदोलन में आजादी के मतवाले फिरंगियों की नजर से बचाकर गुप्ता योजनाओं का संदेश रेशमी रुमाल पर लिखकर आदान-प्रदान करते थे। देश को स्वतंत्र कराने में दारुल उलूम के उलेमा ने जो कुर्बानियां दीं उसको शायद ही कभी भुलाया जा सके। शेखुल हिंद की इन्हीं खिदमात को देखते हुए भारत सरकार द्वारा उनकी तहरीक पर डाक टिकट भी जारी किया गया। आजादी की लड़ाई को नई दिशा व दशा देने वाले मौलाना महमूदुल हसन का जन्म देवबंद के एक इल्मी खानदान में हुआ था। वर्ष 1905 में दारुल उलूम की बागडोर संभालने वाले हसन उन स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे, जिन्हें उनकी कलम, ज्ञान, आचार व व्यवहार आदि विशेषताओं के बूते शेखुल हिद (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभूषित किया गया। मौलाना शेखुल हिद ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए रेशमी रुमाल आदोलन चलाया जो कि भारत को आजाद कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलाया गया पहला आद...

इराक : वहाबी आतंकवादियों के हमले में 14 लोग मारे गए

जुलाई 26, 2016-  अहलेबैत समाचार एजेंसी अबनाः इराकी सूत्रों के अनुसार इराक के दयाली प्रांत के बअकूबा शहर में वहाबी आतंकवादियों के हमले में 14 लोग मारे गए और 20 अन्य घायल हो गए हैं। मेह्र समाचार एजेंसी ने इराक की सरकारी समाचार एजेंसी के माध्यम से लिखा है कि इराक के दयाली प्रांत के बअकूबा शहर में वहाबी आतंकवादियों के हमले में 14 लोग मारे गए और 20 घायल हो गए हैं। रिपोर्टों के अनुसार वहाबी आतंकवादी इराकी सेना के हाथों अपनी असफलताओं का बदला इराकी जनता से ले रहे हैं और निर्दोष लोगों और सार्वजनिक समारोहों को अपनी आपराधिक और क्रूर कार्रवाईयों का निशाना बना रहे हैं।

9/11: वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला CIA ने किया था - खुलासा

न्यू जर्सी के अस्पताल से छुट्टी  मिलने के बाद सेवानिवृत्त सीआईए एजेंट माल्कॉम हावर्ड (79 वर्ष) ने कई सनसनीखेज़ खुलासे किए हैं । ज़िंदगी के आखिरी पडाव पर खड़े माल्कॉम कहते हैं कि मेरे पास अब कुछ ही वक्त बाकी है और वो ये बताना चाहते हैं कि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर धमाके की साजिश में वो शामिल थे। हावर्ड ने सीआईए के लिए एक ऑपरेटर के रूप में काम किया है । सिविल इंजीननियर के रूप में ट्रेंड हावर्ड 80 के दशक की शुरुआत में सीआईए में शामिल होने के बाद एक विस्फोटक विशेषज्ञ बन गए । उन्होंने कहाकि 1997 ले 2001 के बीच सीआईए के संचालन में काम किया और उस वक्त सीआईए ऊपर से आने वाले आदेशों पर काम कर रहा था ।वे उन 4 ऑपरेटर्स की एक सेल का हिस्सा थे जो सुनिश्चित करने में कामयाब रहा कि ब्लास्ट कामयाब रहा । हावर्ड ने कहाकि वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का विध्वंस उनके जीवन का इकलौता अनोखा विध्वंस रहा है । उन्होंने कहा कि वो एक सच्चे देशभक्त हैं इसीलिए उन्होंने वाइट हाउस या सीआईए के निर्णयों पर कभी कोई सवाल नहीं उठाया है । लेकिन अब उन्हें ऐसा लगता है कि कहीं कुछ ऐसा था जो सही नहीं था । उन्होंने कहाकि ये विस्...

Purpose OF Azadari- Moharram 2021

 

इस्लाम आतंक नहीं आदर्श है - स्वामी लक्ष्मी शंकाराचार्य

स्वामी लक्ष्मी शंकाराचार्यः   कई साल पहले दैनिक जागरण में श्री बलराज बोधक का लेख ' दंगे क्यों होते हैं?' पढ़ा, इस लेख में हिन्दू-मुस्लिम दंगा होने का कारण क़ुरआन मजीद में काफिरों से लड़ने के लिए अल्लाह के फ़रमान बताये गए थे.लेख में क़ुरआन मजीद की वह आयतें भी दी गयी थीं. इसके बाद दिल्ली से प्रकाशित एक पैम्फलेट ( पर्चा ) ' क़ुरआन की चौबीस आयतें, जो अन्य धर्मावलम्बियों से झगड़ा करने का आदेश देती हैं.' किसी व्यक्ति ने मुझे दिया. इसे पढने के बाद मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि में क़ुरआन पढूं. इस्लामी पुस्तकों कि दुकान में क़ुरआन का हिंदी अनुवाद मुझे मिला. क़ुरआन मजीद के इस हिंदी अनुवाद में वे सभी आयतें मिलीं, जो पैम्फलेट में लिखी थीं. इससे मेरे मन में यह गलत धारणा बनी कि इतिहास में हिन्दू राजाओं व मुस्लिम बादशाहों के बीच जंग में हुई मार-काट तथा आज के दंगों और आतंकवाद का कारण इस्लाम है. दिमाग भ्रमित हो चुका था.इस भ्रमित दिमाग से हर आतंकवादी घटना मुझे इस्लाम से जुड़ती दिखाई देने लगी. इस्लाम, इतिहास और आज कि घटनाओं को जोड़ते हुए मैंने एक पुस्तक लिख डाली ' इस्लामिक आतंकवा...

बिहार सरकार के अत्याचार पर मजलिसे ओलमाए हिंद बरसा

लखनऊ 22 जुलाई : बिहार के शहर मुजफ्फरपुर में वक्फ माफियों के वकफ भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ 21 जुलाई को जुमे की नमाज के बाद विरोध प्रर्दशन कर रहे नमाजियों पर जिला प्रशासन की बर्बरता और लाठीचार्ज के खिलाफ आज मजलिसे ओलमाए हिंद की और से मौलाना सैयद कल्बे जवाद नकवी के अवास पर 4 बजे एक प्रेस वार्ता का आयोजन हुआ। प्रेस वार्ता में वक्फ माफियाओं के साथ पुलिस की मिलीभगत और नमाजियों पर बेरहमी के साथ की गई लाठीचार्ज और बर्बरता की कड़े शब्दों में निंदा की गई।21जुलाई को जुमे की नमाज के बाद वक्फ माफियाओं के खिलाफ विरोध प्रर्दशन करने वालों पर पुलिस ने बेरहमी के साथ लाठीचार्ज किया और बर्बरता का मुजाहिरा किया जिसके नतीजे में मौलाना शबीब काजिम आई सी यू में ऐडमिट हैं और उनके कई साथी गंभीर रूप से घायल हालत में अस्पताल में जेरे इलाज हैं।इस घटना के तुरंत बाद मौलाना सैयद कल्बे जवाद नकवी ने गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह से फोन पर बात की और नमाजियों पर हुए लाठी चार्ज, उनकी गिरफ्तारी और वक्फ माफियाओं की जिला प्रशासन से मिलीभगत के खिलाफ कार्रवाई की मांॅग की।गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही...