Skip to main content

घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

शहादत : हज़रत इमाम बाकिर और इस्लाम मे सिक्के की ईजाद

 हज़रत इमाम मौहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम पहली रजब 57 हिजरी को जुमा के दिन मदीनाऐ मुनव्वरा मे पैदा हुऐ।

अल्लामा मजलिसी लिखते है कि जब आप बत्ने मादर मे तशरीफ लाऐ तो आबाओ अजदाद की तरह घर मे गैब की आवाज़े आने लगी और जब नो महीने पूरे हुऐ तो फरीश्तो की बेइंतेहा आवाज़े आने लगी और शबे विलादत एक नूर जाहिर हुआ और आपने विलादत के बाद आसमान का रूख किया और (हजरत आदम की तरह) तीन बार छींके और खुदा की हम्द बजा लाऐ, पूरे एक दिन और रात आपके हाथ से नूर निकलता रहा। आप खतना शुदा, नाफ बुरीदा और तमाम गंदगीयो से पाक पैदा हुऐ।

(जिलाउल उयून पेज न. 259-260)
नाम, लक़ब और कुन्नीयत
सरवरे कायनात रसूले खुदा (स.अ.व.व) और लोहे महफूज़ के मुताबिक आपका नाम मौहम्मद था और आपकी कुन्नीयत अबुजाफर थी और आपके बहुत सारे लक़ब थे कि जिन मे बाक़िर, शाकिर, हादी ज़्यादा मशहूर है।

(शवाहेदुन नबुवत पेज न. 181)
लक़बे बाक़िर की वजह
बाक़िर बकरः से निकला है और इसका मतलब फैलाने वाला या शक़ करने देने वाला है।

(अलमुनजिद पेज न. 41)

इमाम बाक़िर को बाक़िर इस लिऐ कहा जाता है कि आपने उलूम को लोगो के सामने पेश किया और अहकाम की हक़ीकतो और हिक्मतो के उन खज़ानो को लोगो के सामने जाहिर किया कि जिनके बारे मे कभी किसी मे बहस न की थी।

(शवाहेदुन नबुवत पेज न. 181)

हज़रत इमाम मौहम्मद बाक़िर करबला मे

आपकी उम्र अभी दो तीन साल ही थी कि आपको अपने दादा और वालिद के साथ अपने वतने अज़ीज़ मदीनाऐ मुनव्वरा को छोड़ना पड़ा और मोहर्रम सन् 61 हि. को करबला मे तशरीफ लाऐ और मसाऐबे करबला व शाम और कूफा के गवाह बने।

और एक साल कूफा मे क़ैद मे रहने के बाद 8 रबीउल अव्वल 62 हि. को मदीना वापस हुऐ।
रसूले अकरम का सलाम
इतिहासकारो का कहना है कि सरवरे कायनात (स.अ.व.व) एक दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपनी गोद मे लिऐ हुऐ प्यार कर रहे थे तो आपके खास सहाबी हज़रत जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी आ गऐ।

रसूले खुदा (स.अ.व.व.) ने इरशाद फरमायाः

ऐ जाबिर। मेरे इस फरज़न्द की नस्ल से एक बच्चा पैदा होगा। जो इल्मो हिकमत से भरपूर होगा और ऐ जाबिर तुम उस बच्चे का जमाना पाओगे और उस वक्त तक ज़िन्दा रहोगे कि जब तक वो इस दुनिया मे न आ जाऐ।

ऐ जाबिर। देखो जब उस से मिलना तो मेरा सलाम उसे कह देना।

जनाबे जाबिर ने इस खबर और भविष्यवाणी को पूरे दिलो दिमाग़ से सुना और उसी वक्त से इस खुश गवार वक्त का इंतेज़ार करने लगे यहा तक कि इस इंतेज़ार मे आप की आखे पथरा गई और आँखो का नूर जाता रहा।

जब तक आपको दिखाई देता था आप इमाम बाक़िर को हर महफिल और मजलिस मे तलाश करते रहे और जब आपकी आँखो का नूर चला गया तो आप आपने इमाम को पुकारना शूरू कर दिया। यहा तक कि लोग आपके दिमाग़ पर शक करने लगे।

और आखिरे कार वो वक्त भी आ गया कि आप पैग़ामे मोहम्मदी को इमाम की खिदमत मे पहुँचाने मे कामयाब हो गऐ।

रावी कहता है कि मैं जनाबे जाबिर के पास बैठा हुआ था तभी देखा कि इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम तशरीफ ला रहे है और आपके साथ इमाम बाक़िर भी है।

इमाम सज्जाद ने इमाम बाक़िर से फरमाया कि बेटा अपने अम्मू जनाबे जाबिर की पेशानी पर बोसा दो।

इमाम बाक़िर ने फौरन जनाबे जाबिर की पेशानी पर बोसा दिया और जनाबे जाबिर ने इमाम बाक़िर को अपने सीने से लगा लिया और कहने लगे कि ऐ रसूल अल्लाह के फरज़न्द आपको आपके दादा रसूले खुदा मौहम्मदे मुस्तुफा ने सलाम कहा है।

इमाम बाक़िर ने इरशाद फरमाया कि ऐ चचा जाबिर उन पर और आप पर भी मेरा सलाम हो।

इसके बाद जनाबे जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी ने इमाम बाकिर से अपने लिऐ शिफाअत के लिऐ ज़मानत की दरखास्त की और हजरत ने क़ुबुल फरमाई।

(शवाहेदुन नबुवत पेज न. 181)
सात साल की उम्र मे इमाम बाकिर का हज
रावी बयान करता है कि मै हज के लिऐ जा रहा था। रास्ता खतरनाक और अंधेरा बहुत ज्यादा था। जैसे ही मे एक सहरा मे दाखिल हुआ तो एक तरफ से कुछ रोशनी की एक किरन नज़र आई। एक दम से एक सात साला बच्चा मेरे क़रीब आया और उसने सलाम किया। मैने सलाम का जवाब दिया और उससे पूछा कि तुम कौन हो, कहाँ से आ रहे हो और कहाँ जा रहे हो और तुम्हारा ज़ादे सफर क्या है।

उसने जवाब दिया कि मै खुदा की तरफ से आ रहा हुँ और खुदा की तरफ जा रहा हुँ। मेरा ज़ादे सफर तक़वा है और मै अरबी नस्ल हुँ और क़ुरैश मे से अलवी खानदान से हुँ और मेरा नाम मौहम्मद इब्ने अली इब्ने हुसैन इब्ने अली इब्ने अबुतालिब है।

रावी कहता है कि ये कह कर न जाने वो कहाँ गायब हो गया।

(शवाहेदुन नबुवत पेज न. 183)



हज़रत इमाम बाकिर और इस्लाम मे सिक्के की ईजाद

मशहूर इतिहासकार ज़ाकिर हुसैन लिखते है कि अब्दुल मलिक बिन मरवान ने इमाम बाक़िर की सलाह से इस्लामी सिक्के को जारी किया। इस से पहले इस्लामी मुल्को मे भी ईरान और रोम का सिक्का चलता था।

इस वाकेये को अल्लामा दमीरी इस तरह नक्ल करते है कि अब्दुल मलिक बिन मरवान ने अपने दौरे हुकुमत मे मिस्र से आने वाले कपड़े और काग़ज़ पर “बाप, बेटा और रूहुल क़ुद्स” (कि जो ईसाईयो का ट्रेडमार्क था) को हटवा कर “अल्लाह गवाही देता है कि उसके सिवा कोई खुदा नही है”लिखवा दिया था कि जो बादशाहे रोम को बहुत बुरा लगा था तो उसने अब्दुल मलिक बिन मरवान से पहले ट्रेडमार्क के बाकी रखने की दरखास्त की लेकिन अब्दुल मलिक बिन मरवान ने उसका कोई जवाब न दिया जिसके नतीजे मे शाहे रोम ने अब्दुल मलिक बिन मरवान को खत लिखा कि अगर तुने मेरी बात न मानी तो मे इस्लामी मुल्को मे चलने वाले अपने सिक्के पर तुम्हारे नबी को गालिया लिखवा दूँगा।

ये सुन कर अब्दुल मलिक सर पकड़ कर बैठ गया और तमाम उलामा से मशविरा किया लेकिन किसी से इस मसले का हल न निकल पाया तो उसे अहलैबैत रसूल के दर पर पनाह ली और इमाम बाकिर को बुलवा कर आप से इस मसले के हल की दरखास्त की।

इमाम बाकिर ने उसे इस्लामी सिक्का छापने की राय दी और उसे बताया कि सिक्के कैसे और किस तरह और कितने वज़न का छपेगा और इमाम ने हुक्म दिया कि सिक्के के एक तरफ कलमऐ तोहीद लिखा जाऐ और दूसरी तरफ रसूले खुदा के नाम के साथ सिक्के के छपने के सन् को लिखा जाऐ।

आपके हुक्म पर अमल किया गया और सिक्का छप कर इस्लामी मुल्को मे फैल गया और साथ ही साथ इमाम के मशविरे से अब्दुल मलिक बिन मरवान ने रोमी सिक्के के लेन-देन पर पाबंदी लगा दी।

जब शाहे रोम को इन सब बातो को पता चला तो वो चुप बैठने के सिवा कुछ न कर सका।

(हयातुल हैवान जिल्द न 1)
अमवी खलीफा हश्शाम बिन अब्दुल मलिक खलीफा बनते ही हज के लिऐ गया। उसने वहा इमाम मौहम्मद बाकिर को देखा कि आप लोगो को वाजो- नसीहत फरमा रहे है। ये देख कर हश्शाम की खानदानी दुश्मनी ने करवट ली औऱ उसने दिल ही दिल सोचा कि इन्हे यही पर ज़लील करना चाहिये।

इसी इरादे से उसने एक शख्स को इमाम की खिदमत मे भेजा कि जाकर कहो कि खलीफा पूछ रहे है कि क़यामत के दिन आखरी फैसले से पहले लोग क्या खाऐंगे और क्या पीयेंगे।

इमाम ने जवाब दियाः जहा हश्रो नश्र होगा वहा मेवेदार दरख्त होंगे लोग इन्ही पेड़ो के फलो को इस्तेमाल करेगे।

बादशाह ने जवाब सुनकर ये कहा कि ये बिल्कुल ग़लत है। क्योकि कयामत के दिन लोग अपनी परेशानीयो और मुसीबतो मे लगे होगे। ऐसे मे खाने पीने की किसे याद आऐगी।

क़ासिद ने यही बात जाकर इमाम से नक़्ल कर दी।

इमाम ने जवाब दिया कि जाओ और बादशाह से कह दो कि तुमने कुरआन भी पढ़ा है या नही।

कि जहन्नुम के लोग जन्नत वालो से कहेंगे कि हमे पानी और कुछ नेमते दे दो कि (कुछ) खा और पी ले। इस वक्त वो (जन्नत वाले) कहेगे कि काफिरो पर जन्नत की नेमते हराम है।

(पारा न. 8 रूकूअ न. 13)

तो जब जहन्नुम के लोग भी खाना-पीना नही भूलेंगे तो क़यामत मे कैसे भूल जाऐगे जिसमे जहन्नुम से कम सख्तीयाँ होगी और वो उम्मीद और जन्नतो जहन्नुम के दरमियान होंगे।

इमाम का जवाब सुनकर हश्शाम शरमिन्दा हो गया।

(तारीखे आईम्मा पेज न. 414)

इमाम बाक़िर और ईसाई पादरी

एक बार इमाम बाक़िर (अ.स.) ने अमवी बादशाह हश्शाम बिन अब्दुल मलिक के हुक्म पर अनचाहे तौर पर शाम का सफर किया और वहा से वापस लौटते वक्त रास्ते मे एक जगह लोगो को जमा देखा और जब आपने उनके बारे मे मालूम किया तो पता चला कि ये लोग ईसाई है कि जो हर साल यहाँ पर इस जलसे मे जमा होकर अपने बड़े पादरी से सवाल जवाब करते है ताकि अपनी इल्मी मुश्किलात को हल कर सके ये सुन कर इमाम बाकिर (अ.स) भी उस मजमे मे तशरीफ ले गऐ।

थोड़ा ही वक्त गुज़रा था कि वो बुज़ुर्ग पादरी अपनी शानो शोकत के साथ जलसे मे आ गया और जलसे के बीच मे एक बड़ी कुर्सी पर बैठ गया और चारो तरफ निगाह दौड़ाने लगा तभी उसकी नज़र लोगो के बीच बैठे हुऐ इमाम (अ.स) पर पड़ी कि जिनका नूरानी चेहरा उनकी बड़ी शख्सीयत की गवाही दे रहा था उसी वक्त उस पादरी ने इमाम (अ.स )से पूछा कि हम ईसाईयो मे से हो या मुसलमानो मे से 

इमाम (अ.स) ने जवाब दियाः मुसलमानो मे से।

पादरी ने फिर सवाल कियाः आलिमो मे से हो या जाहिलो मे से

इमाम (अ.स) ने जवाब दियाः जाहिलो मे से नही हुँ।

पादरी ने कहा कि मैं सवाल करूँ या आप सवाल करेंगे

इमाम (अ.स) ने फरमाया कि अगर चाहे तो आप सवाल करें।

पादरी ने सवाल कियाः तुम मुसलमान किस दलील से कहते हो कि जन्नत मे लोग खाऐंगे-पियेंगे लेकिन पैशाब-पैखाना नही करेंगेक्या इस दुनिया मे इसकी कोई दलील है

इमाम (अ.स) ने फरमायाः हाँइसकी दलील माँ के पेट मे मौजूद बच्चा है कि जो अपना रिज़्क़ तो हासिल करता है लेकिन पेशाब-पेखाना नही करता।

पादरी ने कहाः ताज्जुब है आपने तो कहा था कि आलिमो मे से नही हो।

इमाम (अ.स) ने फरमायाः मैने ऐसा नही कहा था बल्कि मैने कहा था कि जाहिलो मे से नही हुँ।

उसके बाद पादरी ने कहाः एक और सवाल है।

इमाम (अ.स) ने फरमायाः बिस्मिल्लाह सवाल करे।

पादरी ने सवाल कियाः किस दलील से कहते हो कि लोग जन्नत की नेमतो फल वग़ैरा को इस्तेमाल करेंगें लेकिन वो कम नही होगी और पहले जैसी हालत पर ही बाक़ी रहेंगे।

क्या इसकी कोई दलील है

इमाम (अ.स) ने फरमायाः बेशक इस दुनिया मे इसका बेहतरीन नमूना और मिसाल चिराग़ की लौ और रोशनी है कि तुम एक चिराग़ से हज़ारो चिराग़ जला सकते हो और पहला चिराग़ पहले की तरह रोशन रहेगा ओर उसमे कोई कमी नही होगी।

पादरी की नज़र मे जितने भी मुश्किल सवाल थें सबके सब इमाम (अ.स) से पूछ डाले और उनके बेहतरीन जवाब इमाम (अ.स) से हासिल किये और जब वो अपनी कम इल्मी से परेशान हो गया तो बहुत गुस्से आकर कहने लगाः

ऐ लोगों एक बड़े आलिम को कि जिसकी मज़हबी जानकारी और मालूमात मुझ से ज़्यादा है यहा ले आऐ हो ताकि मुझे ज़लील करो और मुसलमान जान लें कि उनके रहबर और इमाम हमसे बेहतर और आलिम हैं।

खुदा कि क़सम फिर कभी तुमसे बात नही करुगां और अगर अगले साल तक ज़िन्दा रहा तो मुझे अपने दरमियान (इस जलसे) मे नही देखोंगे।

इस बात को कह कर वो अपनी जगह से खड़ा हुआ और बाहर चला गया।

(जिलाउल उयून पेज. न. 261)

 शहादत

अगरचे आप अपनी इल्मी खिदमात से इस्लाम को फैला रहे थे लेकिन फिर खानदाने बनी उमय्या की दुश्मनी और जिहालत की वजह से हश्शाम बिन अब्दुल मलिक ने आपको ज़हर से शहीद करा दिया और आप 7 ज़िलहिज 114 हि. को सोमवार के मदीनाऐ मुनव्वरा मे दरजाऐ शहादत पर फाएज हो गऐ। उस वक्त आपकी उम्र 57 साल थी।

(जिलाउल उयून पेज. न. 264)



मजारे मुक़द्दस
आपकी नमाजे जनाज़ा इमाम सादिक़ (अ.स) ने पढ़ाई और आपको जन्नुत बक़ी मे दफ्न किया गया।

(जिलाउल उयून पेज. न. 261)



औलाद

इतिहासकारो ने आपके पाँच बेटे और तीन बेटीयो का जिक्र किया है। जिनके नाम ये है।

1. इमाम जाफर सादिक़

2. अब्दुल्लाह अफतह

3. इब्राहीम

4. अब्दुल्लाह

5. अली

6. लैला

7. जैनब

8. उम्मे सलमा

(इरशाद पेज न. 294)



Comments

Popular posts from this blog

बोको हराम आतंकवादियों के हमले में नाइजीरिया के शिया स्कूल में तीन मुसलमानों की हत्या

  तीन शिया मुसलमानों की हत्या उस समय कर दी गई जब संदिग्ध बोको हराम तकफिरी आतंकवादियों ने यॉबे राज्य के गाइडम स्थानीय सरकार क्षेत्र में फुदैया इस्लामिक स्कूल पर हमला किया। इन आतंकवादियों ने शुक्रवार को स्कूल पर हमला किया, जहां शिया समुदाय आमतौर पर धार्मिक गतिविधियाँ करता है।  आतंकवादियों ने पहले हवा में गोलीबारी की और फिर मोहम्मद सालेह, अहमद अब्दुलरहमान, और अब्दुल्लाही आदम की हत्या कर दी। एक और पीड़ित को, जो हमले में बच गया था, इलाज के लिए एनगुरू शहर के अस्पताल में ले जाया गया।  नाइजीरिया में शिया मुसलमानों को बोको हराम आतंकवादियों द्वारा गंभीर रूप से निशाना बनाया गया है। 2014 में, बोको हराम के आत्मघाती हमलावर ने यॉबे राज्य के पोटिसकुम शहर में एक शिया धार्मिक समारोह में 15 उपासकों की हत्या कर दी थी।

घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

Purpose OF Azadari- Moharram 2021

 

नियोग प्रथा पर मौन, हलाला 3 तलाक पर आपत्ति ? एक बार जरुर पढ़े

3 तलाक एवं हलाला पर आपत्ति जताने वाले आखिर नियोग प्रथा पर खामोश क्यों हैं, हलाला ठीक है या ग़लत कम से कम विवाहित महिला शारीरिक संबंध अपने पति से ही बनाती है! पर नियोग प्रथा से संतान सुख के लिए किसी भी ब्राह्मण पुरुष से नियोग प्रथा के अनुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकती है! यह कितना बड़ा अत्याचार और पाप हुआ? नियोग प्रथा क्या है? हिन्दू धर्म में एक रस्म है जिसे नियोग कहते है , इस प्रथा के अनुसार किसी विवाहित महिला को बच्चे पैदा न हो रहे हो तो वो किसी भी ब्राह्मण पुरुष से नियोग प्रथा के अनुसार उससे शारीरिक संबंध बना सकती है! नियोग प्रथा के नियम हैं:- १. कोई भी महिला इस प्रथा का पालन केवल संतान प्राप्ति के लिए करेगी न कि आनंद के लिए। २. नियुक्त पुरुष केवल धर्म के पालन के लिए इस प्रथा को निभाएगा। उसका धर्म यही होगा कि वह उस औरत को संतान प्राप्ति करने में मदद कर रहा है। ३. इस प्रथा से जन्मा बच्चा वैध होगा और विधिक रूप से बच्चा पति-पत्नी का होगा , नियुक्त व्यक्ति का नहीं। ४. नियुक्त पुरुष उस बच्चे के पिता होने का अधिकार नहीं मांगेगा और भविष्य में बच्चे से कोई रिश्ता नहीं रखेगा। ...

घरों में कम होता खुलापन बना रहा बीमार - जरूरी बात

लंदन एजेंसियां :वायु प्रदूषण का खतरा सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं हैं। घरों में घटता खुलापन और आराम देने वाले आधुनिक उपकरणों से पनप रहा अंदरूनी प्रदूषण भी लोगों को बीमार कर रहा है। यह अंदरूनी प्रदूषण श्वसन रोग समेत फेफड़े की कई बीमारियों कारण बन रहा है। ब्रिटिश विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में यह चेतावनी दी है।   अंदरूनी प्रदूषण की अनदेखी : शोधकर्ताओं ने कहा, बाहर के वायु प्रदूषण के खतरों से हम सभी परिचित हैं। यह हर साल ब्रिटेन में 40 हजार और अमेरिका में दो लाख लोगों की असमय मौत का कारण बनता है। लेकिन ज्यादातर लोगों को इसका अंदाजा नहीं है कि छोटे घर के भीतर की प्रदूषित वायु भी स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। घरेलू उपकरणों का असर : उन्होंने कहा, आजकल ज्यादातर घरों में गैस-चूल्हों का इस्तेमाल किया जाता है। घरों की साफ-सफाई के लिए रासायनिक स्वच्छता उत्पादों का प्रयोग होता है। कमरों को गर्म या ठंडा रखने के लिए एयरकंडीशनर का इस्तेमाल भी आम है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये सारी चीजें घर की अंदरूनी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं, जिनका असर हमारे फेफड़ों पर पड़ता है। ...

फ्रांस में हो रहा है मुसलमानों पर अत्याचार देखें वीडियो वायरल।

 सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है जिसमें फ्रांस के पुरुष पुलिसकर्मियों के द्वारा एक मुस्लिम महिला के ऊपर अत्याचार करते हुए दिखाया जा रहा है   आप भी वीडियो देखें और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें कि किस प्रकार फ्रांस की हकूमत मुसलमानों के साथ अत्याचार कर रही है। नोट- हमे अभी तक इस बात की  पुष्टि नहीं हुई है कि यह वीडियो फ्रांस की है। मगर अगर यह फ्रांस की वीडियो है तो बहुत ही निंदिया है। ट्रंप की हार और जो बिडेन जीते।

सऊदी अरब का यमन पर अत्याचार जारी

अहलेबैत समाचार एजेंसी अबनाः यमनी जनता के खिलाफ सऊदी अरब की आपराधिक कार्यवाही जारी है और सऊदी अरब के युद्धक विमानों ने यमन के मआरब प्रांत के भरे बाजार पर बम बरसाए हैं कि जिसमें दर्जनों लोगों के मारे जाने की आशंका जताई जा रही है। अल-अहेद की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब के लड़ाकू विमानों ने जिस समय मआरब में बाजार पर बमबारी की उस समय बाजार में बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे इस क्रूर और आपराधिक हवाई हमले के परिणाम स्वरूप बड़े पैमाने पर यमनी जनता के नरसंहार की आशंका जताई जा रही है। सूत्रों के अनुसार सऊदी अरब यमन में अपने घिनौने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका जिसकी वजह से वह यमन के बाजारों, अस्पतालों, स्कूलों, मस्जिदों और पार्कों को अपनी क्रूरता व बर्बरता का निशाना बना रहा है। सऊदी अरब के भयानक अपराधों में अमेरिका और इस्राईल भी बराबर के भागीदार हैं।

एक बार फिर: मुस्लिम समाज बना फरिश्ता - मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसा

यूपी के मुजफ्फरनगर में खतौली के पास शनिवार को कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटना की शिकार हो गई। हादसे में 23 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि 40 लोग घायल हुए हैं। भले ही कुछ मिट्ठी भर लोग मुस्लिम समाज को बुरी नज़र से देखते हो पर सत्य यह है के हमेशा देश को बनाने मानवता के लिए हमेशा से सब से आगे खड़ा मिलता है ऐसा ही कुछ  मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसा में हुआ ।  नवभारतटाइम्स.कॉम के अनुसार हादसे का शिकार हुई उत्कल एक्सप्रेस के यात्रियों को स्थानीय लोगों की भरपूर मदद मिली। हादसे के बाद रेलवे की टीम के मौके पर पहुंचने से पहले ही स्थानीय लोग यात्रियों की मदद के लिए पहुंच गए थे और रेस्क्यू टीम के पहुंचने के बाद भी स्थानीय लोगों ने राहत और बचाव के काम में अपना सहयोग जारी रखा। लोगों ने यात्रियों को न सिर्फ बाहर निकालने में मदद की बल्कि उन्होंने खाना और जरूरत की अन्य चीजें भी यात्रियों को मुहैया कराईं। इमरान अली ने नाम के युवक ने कहा, 'स्थानीय लोगों ने हादसे के पीड़ित यात्रियों की मदद करने की पहल की और रात से ही हम उनकी मदद में जुटे हैं। हमने उन्हें खाना भी खिलाया। किसी ने हमें ...

#ShiaAzadari इमाम हुसैन (अ.स.) के बलिदान का उद्देश्य! दुआएं कबूल क्यों नहीं होती? #Azadari2021