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घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

विलायत अली . ईद ग़दीर का इतिहास जाने , ईद ग़दीर की फ़ज़ीलत

जिस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के पास ईश्वरीय संदेश वही लाने वाले फ़रिश्ते हज़रत जिबरईल मायदा सूरे की आयत नंबर 67 लेकर उतेर कि जिसमें ईश्वर कह रहा है, हे पैग़म्बर! जो बात आप तक पहुंचायी जा चुकी है उसे लोगों तक पहुंचा दीजिए, पैग़म्बरे इस्लाम किसी बात से बहुत चिंतित थे। उन्हें इस्लाम के भविष्य की ओर से चिंता थी। यही कारण था कि आयत नंबर 67 के संदेश को पहुंचाने में विलंब करते जा रहे थे ताकि उचित समय पर ईश्वर के इस संदेश को लोगों तक पहुंचाएं किन्तु ईश्वर का यह संदेश दुबारा कुछ और बातों के इज़ाफ़े के साथ आया। इस बार के संदेश में एक तरह की धमकी थी। ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम से दो टूक शब्दों में कहा कि अगर आपने यह संदेश नहीं पहुंचाया तो मानो आपने अपना दायित्व नहीं निभाया। उसके बाद ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम को यह भी संदेश भिजवाया कि वह उन्हें लोगों की ओर से ख़तरे से बचाएगा।                       

दसवीं हिजरी क़मरी का ज़माना था। पैग़म्बरे इस्लाम ने हज का एलान किया और लोगों को यह कहलवा भेजा कि जिस जिस व्यक्ति में हज करने की क्षमता है वह ज़रूर हज करे क्योंकि ईश्वर के दो संदेश अभी भी संपूर्ण रूप में लोगों तक नहीं पहुंचे थे। एक हज और दूसरा पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी का विषय था। इस सार्वजनिक एलान के बाद ज़्यादातर मुसलमान हज के मौक़े पर मक्का पहुंचे ताकि हज के विषय को विस्तार से समझ सकें। इसके अलावा पैग़म्बरे इस्लाम ने सांकेतिक रूप में यह भी कहलवा दिया था कि यह उनका आख़िरी हज होगा। यही कारण था कि सन दस हिजरी क़मरी के हज के अवसर पर 120000 हाजी हज करने पहुंचे। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम हज के संस्कार एक के बाद एक अंजाम देते और उसके बारे में विस्तार से बताते जाते थे।

 मिना के मैदान में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने एक बड़ा भाषण दिया। इस भाषण में पैग़म्बरे इस्लाम ने सबसे पहले मुसलमानों की जान, माल, और इज़्ज़त की नज़र से सामाजिक सुरक्षा का उल्लेख किया। उसके बाद अज्ञानता के काल में निर्दोष लोगों के बहाए गए ख़ून और छीने गए माल को क्षमा कर दिया ताकि लोगों के मन से एक दूसरे के प्रति द्वेष ख़त्म हो जाए और सामाजिक सुरक्षा के लिए माहौन बन जाए। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने मुसलमानों को आपस में मतभेद व फूट से दूर रहने की सिफ़ारिश की और एक प्रसिद्ध कथन सुनाया जो ‘हदीसे सक़लैन’ के नाम से मशहूर है।

पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा, मैं दो मूल्यवान चीज़ें तुम्हारे बीच छोड़ कर जा रहा हूं अगर इन दोनों से जुड़े रहे तो मेरे बाद कभी भी सही राह से नहीं भटकोगे। एक ईश्वर की किताब क़ुरआन और दूसरे मेरे पवित्र परिजन हैं। मिना के मैदान में ठहराव के तीसरे दिन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने लोगों को ख़ीफ़ नामक मस्जिद में इकट्ठा होने का आदेश दिया। वहां भी पैग़म्बरे इस्लाम ने भाषण दिया। इस भाषण में लोगों को कर्म में शुद्धता, मुसलमानों के मार्गदर्शक के साथ हमदर्दी और आपस में मतभेद से दूर रहने की नसीहत की और इस बात पर बल दिया कि मुसलमान आपस में ईश्वरीय आदेश के अनुसार, अधिकार की दृष्टि से बराबर हैं। उसके बाद अपने उत्तराधिकरी जैसे महत्वपूर्ण विषय की ओर संकेत किया और हदीसे सक़लैन को दोहराया।            

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम अपनी जन्म भूमि मक्का से दस साल तक दूर रहने के बाद, मक्का लौटे थे। इसलिए लोग यह समझ रहे थे कि वह हज के संस्कार पूरे होने के बाद कुछ दिन वहां ठहरेंगे। लेकिन जैसे ही हज ख़त्म हुआ पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत बेलाल से कहा कि वह लोगों तक यह संदेश पहुंचाए कि सबके सब मक्का से बाहर निकलें। लगभग सभी हाजी पैग़म्बरे इस्लाम के साथ थे। यहां तक कि यमन के वे हाजी भी उनके साथ थे जिनका मार्ग उत्तर की ओर था। जब हाजियों का यह कारवां कुराअल ग़मीम नामक क्षेत्र में पहुंचा जहां ग़दीरे ख़ुम स्थित है, तो पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि हे लोगो! मेरी बात को मानो कि ईश्वर का पैग़म्बर हूं। पैग़म्बर का यह वाक्य किसी बहुत बड़े संदेश की पृष्ठिभूमि था। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने सारे हाजियों को रुकने का आदेश दिया।

इस आदेश पर सारे हाजी रुक गए। जो हाजी आगे बढ़ गए थे वे पीछे लौटे यहां तक कि सारे हाजी ग़दीरे ख़ुम नामक इलाक़े में इकटठा हो गए। वहां पर मौजूद पत्थरों और ऊंटों के कजावे से लोगों के बीचो बीच बहुत ऊंचा मिम्बर बनाया गया ताकि पैग़म्बरे इस्लाम जब भाषण दें तो सबके सब उन्हें देख सकें और उनकी बात सुन सकें। लोगों की प्रतीक्षा की घड़ी ख़त्म हुयी। पहले अज़ान दी गयी और हाजियों ने ज़ोहर की नमाज़ पढ़ी। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम मिंबर पर खड़े हुए और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बुलवाया और उनसे मिंबर के दाहिने ओर एक पायदान नीचे खड़े होने के लिए कहा।
उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने दुनिया वालों के लिए अपना आख़िरी भाषण देना शुरु किया। उन्होंने ईश्वर की प्रशंसा व गुणगान के बाद कहा कि ईश्वर ने मुझे यह संदेश भेजा है, हे पैग़म्बर जो बात आप पर पहले भेजी जा चुकी है उसे लोगों तक पहुंचाइये। अगर ऐसा न किया तो मानो पैग़म्बरी का दायित्व नहीं निभाया और ईश्वर उन लोगों से आपकी रक्षा करेगा जो आपको नुक़सान पहुंचाना चाहते हैं। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने प्रेम व स्नेह से भरे स्वर में लोगों से कहा, हे लोगो! ईश्वर ने जो कुछ मुझ पर नाज़िल किया उसे पहुंचाने में मैंने तनिक लापरवाही नहीं की। मैं आप लोगों को इस आयत के उतरने का कारण बताना चाहता हूं। जिबरईल तीन बार मेरे पास आए और ईश्वर की ओर से मुझे यह आदेश दिया कि आप सबको यह बताऊं कि अली इब्ने अबी तालिब मेरे भाई मेरे बाद मुसलमानों पर मेरे उत्तराधिकारी व इमाम हैं। हे लोगो! मैंने जिबरईल से कहा कि ईश्वर से कहो कि मुझे यह संदेश पहुंचाने की ज़िम्मेदारी से माफ़ कर दें क्योंकि मैं जानता हूं कि ईश्वर से डरने वाले कम, मिथ्याचारी और इस्लाम का मज़ाक़ उड़ाने वालों तथा चालबाज़ों की संख्या ज़्यादा है लेकिन ईश्वर ने तीसरी बार मुझे यह धमकी दी कि अगर मैंने उसे नहीं पहुंचाया जिसके पहुंचाने का मुझे आदेश दिया गया है, तो मैने अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया। पैग़म्बरे इस्लाम ने ग़दीर में दिए गए अपने भाषण में अपने बाद अपने 12 उत्तराधिकारियों का आधिकारिक रूप से एलान किया और कहा कि इस तरह की भीड़ को मैं आख़िरी बार संबोधित कर रहा हूं। तो मेरी बात ध्यान से सुनो और उस पर अमल करो। ईश्वर के आदेश के सामने नत्मस्तक हो जाओ! वैध काम करने और अवैध व वर्जित काम से दूर रहने का आदेश देता हूं।

मुझे यह आदेश दिया गया है कि तुम लोगों से मोमिनों के इमाम अली और उनकी नस्ल से जो इमाम आएंगे उनके आज्ञापालन का तुमसे वचन लूं। मेरे आख़िरी उत्तराधिकारी महदी होंगे जो अंतिम दौर में प्रकट होंगे। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने लोगों से आधिकारिक रूप से हज़रत अली के आज्ञापालन का वचन पैने के लिए कहा, हे लोगों तुम्हारा स्थान इस बात से कहीं ऊंचा है कि तुम लोग एक एक करके हमारे आज्ञापालन का वचन देने के लिए अपना हाथ हमारे हाथ में दो हालांकि ईश्वर की ओर से यह ज़िम्मेदारी मुझे दी गयी है कि तुममें से हर एक की ज़बान से इस बात का इक़रार करवाऊं कि मोमिनों पर हज़रत अली की हुकूमत को स्वीकार करते हे और इस बात की भी ज़िम्मेदारी दी गयी है कि मेरे कुटुंब और अली की नस्ल से आने वाले इमामों की इमामत और विलायत को मानने का तुमसे वचन लूं। अब जबकि ऐसा है तो तुम सबके सब एक आवाज़ में कहो, आपने जो कुछ अली और उनकी नस्ल से आने वाले इमामों की विलायत और असीमित नेतृत्व के बारे में ईश्वर की ओर से हम तक पहुंचाया, उसे हमने सुना और हम उसके पालन पर नत्मस्तक हैं और इससे प्रसन्न हैं।

अब हम अपनी ज़बान, मन और पूरे वजूद से अली विलायत के बारे में आपका आज्ञापालन करते और इस बात का वचन देते हैं कि इसी आस्था के साथ ज़िन्दगी गुज़ारेंगे और इसी आस्था के साथ इस दुनिया से जाएंगे यहां तक कि प्रलय के दिन उठाए जाएं। यह सुनकर लोगों ने एक साथ कहा, जी हां हमने सुना और ईश्वर व उसके पैग़म्बर के आदेश के अनुसार अपनी ज़बान, मन और हाथ से पालन करेंगे। इसके बाद लोग पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पास इकट्ठा होने लगे और उनके हाथ पर हाथ रख कर आज्ञापालन का वचन देना शुरु किया। जब पैग़म्बरे इस्लाम ने यह देखा तो हज़रत अली की विलायत के मामले को मज़बूत करने के लिए दो ख़ैमे लगाने का आदेश दिया ताकि लोग सुव्यवस्थित रूप से हज़रत अली अलैहिस्सलाम के आज्ञापालन का ले सकें। इस प्रकार एक ख़ैमे में पैग़म्बरे इस्लाम और दूसरे ख़ैमे में हज़रत अली अलैहिस्सलाम उपस्थित हुए। लोग छोटे-छोटे गुटों में पहले पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के ख़ैमे में जाते और उनके आज्ञापालन का वचन व बधाई देते। उसके बाद लोग हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ख़ैमे में जाते।

पैग़म्बरे इस्लाम के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में उनकी आज्ञापालन का वचन देते और उन्हें मोमिनों के इमाम की उपाधि से संबोधित करके सलाम करते और बधाई देते। अभी भीड़ अपनी जगह पर थी कि ईश्वरीय संदेश वही लाने वाले फ़रिश्ते हज़रत जिबरईल पैग़म्बरे इस्लाम के पास मायदा सूरे की तीसरी आयत लेकर पहुंचे। इस आयत में ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम को इस बात की शुभसूचना दी, आज आपका धर्म परिपूर्ण हो गया। अपनी अनुकंपाएं आप पर पूरी कर दीं और इस्लाम को तुम्हारे लिए धर्म के रूप में पसंद किया। जी हां इस बार मरुस्थल में ग़दीर में पानी का छोटा सा स्रोत आस्था व पहचान का समुद्र बन गया ताकि आने वाली पीढ़ियां उससे अपनी आध्यात्म की प्यास को तृप्त करती रहें। ग़दीर, पैग़म्बरे इस्लाम के मन पर झरने की भांति उतरने वाले संदेश से छलकने लगा और पवित्र इस्लाम की स्थिरता का प्रतिबिंबन ग़दीरे ख़ुम के स्वच्छ पानी में दिखने लगा।


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