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घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

एकता: दशकों से मुस्लिम समाज नौगावां सादात में रामलीला का आयोजन करा रहें हैं

नौगावां सादात में श्रीधार्मिक रामलीला कमेटी के तत्वावधान में रामलीला का मंचन शुरू हो गया। कमेटी के अध्यक्ष गुलाम अब्बास किट्टी हिन्दू भाइयों की पूजा-अर्चना के बाद फीता काट कर मंचन का शुभारंभ किया। बता दें कि नौगावां सादात की रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। इस मौके पर  कमेटी के उपाध्यक्ष इंद्रजीत सिंह ,सुदेश बाल्मीकि , आफताब अडवाणी , आशोक कुमार , शबाब हैदर,  व देवेश  मौजूद रहे। 
उत्तरप्रदेश के तहसील नौगावां सादात एक मुस्लिम बहूसंख्यक क्षेत्र है पर यहाँ हिन्दू - मुस्लिम एक साथ मिलकर अपने अपने त्यौहार मिलकर मनाते हैं  इसी लिए यहाँ एकता की  मिसाल मौजूद है। 
नौगावां सादात की रामलीला पुरे भारत में सद्भाव की मिसाल है। यहां के मुसलमान 1973 से रामलीला का मंचन कर रहे हैं जो पुरे भारत के लिए एक सन्देश है । यहाँ के मुस्लमान चंदा देने से लेकर विजयादशमी तक कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। रामलीला प्रबंध कमेटी भी मुस्लिम ही चला रहे हैं।
श्री धार्मिक रामलीला कमेटी का गठन 1973 में समाजसेवी एवं भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य सुवार्गीय अहसान अख्तर ने किया था वे  कमेटी के पहले अध्यक्ष थे । 30 वर्ष तक उन्होंने रामलीला के आयोजन में भागीदारी निभाई। फिर उनके भतीजे गुलाम अब्बास (किट्टी) को अध्यक्ष बनाया गया। इसके अलावा कस्बे के अन्य मुस्लिम भाई रामलीला के आयोजन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।
राम सिंह गुप्ता  बताते हैं कि चंदा की शुरुआत भी मुस्लिम भाई करते हैं और रामलीला का उद्घाटन भी मुस्लिम भाइयों द्वारा कराया जाता है। कलाकार लाने से लेकर सभी प्रकार के प्रबंध मुस्लिमों के हाथ में ही रहते हैं।
श्री धार्मिक रामलीला कमेटी के अध्यक्ष गुलाम अब्बास (किट्टी) ने बताया है की इस वर्ष मुहर्रम के चलते रामलीला का मंच 11 सितम्बर से शुरू किया जा रहा। 
"श्री धार्मिक रामलीला कमेटी" के अध्यक्ष गुलाम अब्बास (किट्टी) कहते हैं कि यहाँ के लोग सभी हिन्दू भाई मुहर्रम पर इमाम हुसैन (अ स) का ग़म मनाते हैं और अज़ादारी करने में भी अपना योगदान देते हैं तो इसी लिए हम भी उनके त्योहारों को मनाने के लिए उनको प्रोत्साहित करते हैं। ý






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"विश्व अली असग़र दिवस" मोहर्रम की पहली तारीख़ मनाया जाएगा

"अली असग़र विश्व दिवस" इस वर्ष 22 सितम्बर शुक्रवार को 41 देशों में एक साथ मनाया जाएगा। "अली असग़र विश्व दिवस" कार्यक्रम का आयोजन करने वाली संस्था के अध्यक्ष दाऊद मनाफ़ी ने एक प्रेसवार्ता में बताया है कि हज़रत इमाम हुसैन (अ) के 6 महीने के दूध पीते बेटे हज़रत अली असग़र (अ) की याद में आयोजित होने वाले "अली असग़र विश्व दिवस" इस वर्ष इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मोहर्रम की पहली तारीख़ अर्थात 22 सितम्बर शुक्रवार को ईरान सहित दुनिया के 41 देशों में मनाया जाएगा।   संस्था के अध्यक्ष ने बताया कि अली असग़र विश्व दिवस के अवसर पर ईरान से छोटे बच्चों के पहनने के लिए तैयार सफ़ेद और हरे रंग के लगभग एक लाख कपड़े दुनिया के 41 देशों में भेजे जा रहे हैं। उन्होंने बताया हज़रत अली असग़र के नाम से "अली असग़र विश्व दिवस" का आयोजन करने वाली उनकी संस्था ने दुनिया की आठ भाषाओं जिनमें, अरबी, उर्दू, अंग्रेज़ी, रूसी, आज़री, तुर्की इस्तांबूली, स्वाहिली और  हौसा भाषा हैं। इस संस्था ने एक किताब भी प्रकाशित की है जिसके द्वारा दुनियाभर के लोगों तक इमाम हुसैन (अ) और हज़रत ...

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प्राप्त जानकारी के अनुसार तेहरान हमलों से कुछ देर पहले ही आतंकियों ने मरियम रजवी से भेंट की थी जिस में एक सऊदी अधिकारी ने वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिये भाग लिया । इस भेंट में रियाज़ में रह रहा सीरिया सशस्त्र विद्रोहियों का नेता नस्र हरीरी, जैश ए फतह का आतंकी यासिर अब्दुर रहीम, इस्राईल और जॉर्डन ख़ुफ़िया एजेंसी का एजेंट अबू जौलानी आदि सम्मिलित थे । इस बैठक मे सऊदी अधिकारी ने वीडियो कांफ्रेंस द्वारा सम्बोधित किया । इस मीटिंग में सीरिया से पलट कर गए स्लीपर सेल्स के तेहरान उद्देश्यों के बारे में चर्चा की गयी। रजवी और आतंकी कमांडरों के बीच इस मीटिंग में ईरान और विशेष रूप से इमाम खुमैनी के मज़ार पर हमले के लिए सहयोग को सुनिश्चित करना था । सऊदी अधिकारी द्वारा पूछे गए सवाल कि इन हमलों का फायदा क्या हो सकता है के जवाब में मरियम रजवी ने कहा कि यह हमले इमाम खुमैनी की बरसी पर दिए गए आयतुल्लाह ख़ामेनई के अंतिम भाषण का जवाब होगा ।

रमज़ान में कोशिश करनी चाहिए कि ख़ाना सादा हो

रमज़ान का महीना मुबारक हो  रमज़ान के मुबारक महीने में हमारा भोजन पहले के मुक़ाबले ज़्यादा चेंज नहीं होना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि ख़ाना सादा हो. इसी तरह इफ़तार का सिस्टम इस तरह सेट किया जाना चाहिए कि नैचुरल वज़्न पर कोई ज्यादा असर न पड़े। दिन में लंबी मुद्दत की भूख के बाद ऐसे खाने प्रयोग करें जो देर हज़म हों। देर हजम खाने कम से कम 8 घंटे हाज़मा सिस्टम में बाकी रहते हैं. हालांकि जल्दी हज़्म होने वाले खाने केवल 3 या 4 घंटे पेट में टिक सकते हैं और इंसान बहुत जल्दी भूख महसूस करने लगता है। देर हजम खाने जैसे अनाजः जौ, गेहूँ, बीन्स, दालें, चावल कि जिन्हें "कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट" कहते हैं। भोजन को बललते रहना चाहिए. यानी हर तरह के भोजन का उपयोग किया जाए जैसे फल, सब्जियां, गोश्त, मुर्गी, मछली, रोटी, दूध और अन्य दूध से बनी चीजें। तली हुई चीजें बहुत कम इस्तेमाल की जाएं. इसलिए कि हजम न होने, पेट में जलन पैदा होने और वज़न में बढ़ोतरी का कारण बनती हैं। किन चीजों से बचें? 1: तली हुई और चर्बी दार खानों से 2: ज़्यादा मीठी चीजों से 3: सहर के समय ज़्यादा खाना खाने से 4: सहर क...

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