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घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

अल्लाह के एक होने पर यक़ीन और उसके कई होने को नकारना को तौहीद कहते हैं

तौहीद का मतलब अल्लाह को एक मानना है। दर्शन और तर्क शास्त्र में इस के कई मतलब हैं लेकिन सब का अंत में मतलब यही होता है कि अल्लाह को एक माना जाए। इस संदर्भ में बहुस ती विस्तृत चर्चाओं का बयान हुआ है लेकिन यहाँ पर सब का बयान उचित नहीं होगा।इस लिए यहाँ पर हम तौहीद के केवल उन्हीं अर्थों और परिभाषाओं का बयान करेगें जो ज़्यादा विख्यात हैं।
1.  संख्या को नकारनातौहीद की सर्वाधिक विख्यात परिभाषा, अल्लाह के एक होने पर यक़ीन और उसके कई होने को नकारना है। अल्लाह के लिए ऐसी विधिता को नकारना है जो उसके वुजूद से बाहर हो । यह यक़ीन दो या कई अल्लाह में ईमान रखने के विपरीत है।
2.  मिश्रण को नकारनातौहीद की दूसरी परिभाषा अल्लाह के अनन्य होने की है यानी वह ऐसा एक है कि जो कई वस्तओं से मिल कर एक नहीं बना है।इस मतलब को प्रायः उसके अवगुणों को नकार कर साबित किया जाता है जैसा कि हम ने दसवें पाठ में इस ओर इशारा किया है।
3.  उसके वुजूद से अतिरिक्त गुणों को नकारनातौहीद की एक दूसरे परिभाषा उसके गुणों और उसके वुजूद में अंखडता होना है इस अल्लाह के गुणों को एकल मानना कहा जाता है। इस विपरीत कुछ लोग अल्लाह गुणों को उसके वुजूद से अलग और बाद में उससे जुड़ जाने वाली चीज़ मानते हैं।अल्लाह के गुण और वुजूद के एक होने का तर्क यह है कि अगर अल्लाह के प्रत्येक गुण, अलग अलग रूप से यर्थात होते हों तो इस की कुछ दशाएं होंगीः वह गुण जिसके लिए होंगे वह चीज़ अल्लाह के वुजूद के भीतर होगी और ऐसी दशा में यह ज़रूरी होगा अल्लाह का वुजूद कई हिस्सों से बनने वाली चीज़ हो जाए और यह हम पहले ही साबित कर चुके हैं कि ऐसा होना संभव नहीं है या दूसरी दशा यह हो सकती है कि यह गुण जिस चीज़ पर यर्थात होते हैं वह अल्लाह के वुजूद से बाहर की चीज़ होगी तो फिर अगर वह अल्लाह के वुजूद से बाहर होगी तो या तो आत्मभू होगी या फिर स्वयंभू नहीं होगी। अगर स्वयंभू होगी तो तो अल्लाह के अतिरिक्त दूसरी वस्तु, चाहे वह गुण ही क्यों न हो, स्वंभू हो जाएगी और हम साबित कर चुके हैं कि स्वंभू ही अल्लाह होता है त इस तरह से सीधे रूप से अनेकश्वरवाद को मानना पड़ेगा जो निश्चित रूप से गलत है और तौहीद में ईमान रखने वाला कोई इंसान यह दशा स्वीकार नहीं करेगा।लेकिन अगर गुणों के लिए यह माना जाए कि वह स्वंभ नहीं हैं तो फिर इस का मतलब होगा कि अल्लाह ने, जो ख़ुद ख़ुदभू नहीं हैं तो फिर इस का मतलब यह होगी कि अल्लाह ने, जो ख़ुद ख़ुदभू है, अपने भीतर इन गुणों के न होते हुए उन्हें पैदा किया है और फिर उन गुणों को ग्रहक किया है। उदाहरम स्वरूप अल्लाह जीवित होने का गुण नहीं रखता था पिर उस ने जीवंत होने का गुण पैदा किया और फिर उस ग्रहक किया और इस तरह से वह जीवित हुआ और इसी तरह इल्म व ताक़त जैसे उसके गुण। जब कि यह संभव नहीं है कि रचयता कारक, ख़ुद ही अपनी रचनाओं के गुणों का मालिक न हों और इस से ज़्यादा बुरी बात यह होगी कि इस दशा में वह अपनी पैदा की हुई चीज़ की सहायता से जीवन इल्म व ताक़त जैसे गुण हासिल करेगा।इस तरह की धारणाओं के गलत साबित होने से यह स्पष्ट हो जाता है कि अल्लाह के गुण एक दूसरे औस ख़ुद उसके वुजूद से भिन्न नहीं हैं बल्कि सब क सब ऐसे मतलब हैं जो एकल वुजूद यानी अल्लाह से निकले हुए हैं।
4.  कार्यों में तौहीदतौहीद की चौथी परिभाषा, कार्यों में होती है और इस का मतलब यह होता है कि अल्लाह को अपने काम करने के लिए किसी भी इंसान या चीज़ की ज़रूरत नहीं होती और कोई भी उसकी किसी भी तरह से सहायता नहीं कर सकता।यह बात मूल रचयता कारक की विशेषता यानी सारी रचनाओं के उस पर निर्भर होने के मतलब के मद्देनज़र साबित होती है क्योंकि इस तरह के कारक की रचना, अपने पूरे वुजूद के साथ अपने कारक पर निर्भर होती है और किसी भी तरह से स्वाधीन नहीं होती।दूसरे शब्दों मेः जिस के पास जो कुछ भी है वह उसी की दी हुई ताक़त व सामर्थ के बल पर है और किसी भी चीज़ पर स्वामित्व और हर तरह की क्षमता व ताक़त का स्रोत अल्लाह है। ठीक उसी तरह से जैसे दास के स्वामित्व में रहने वाली चीज़ें उसके मालिक की होती हैं और दास को उसे इस्तेमाल करने की अनुमति होती हैं तो फिर ऐसी दशा में यह कैसे संभव है कि अल्लाह को उन लोगों की सहायता की ज़रूरत हो जिन का वुजूद और जनि के पास मौजूद हर चीज़ ख़ुद उसकी न होकर अल्लाह की ही हो।
5.  स्वाधीन प्रभावयह तौहीद की पाँचवी विशेषता है और इस का मतलब यह होता है कि अल्लाह की रचनाएं अपने कामों में भी स्वाधीन नहीं है बल्कि उन्हें अल्लाह की ज़रूरत होती है वह एक दूसरे पर जो प्रभाव डालती हैं उसके लिए भी उन्हें अल्लाह की ज़रूरत होती है और उसी की अनुमति से यह संभव होता है।वास्तव में जो स्वाधीन रूप से और बिना किसी दूसरे की सहायता और ज़रूरत के हर स्थान पर हर चीज़ को प्रभावित करता है वह वही अल्लाह है और दूसरों के प्रभाव और उन का कारक होना उसी की दी हुई ताक़त के बल पर संभव होता है।इसी आधार पर क़ुर्आने मजीद, प्रकृतिक कारकों के प्रभावों को अल्लाह से संबंधित बताता है मिसाल के तौर पर क़ुर्आने मजीद ने वर्षा, पेड़ पौधों का उगना, पेड़ों में फल आदि जैसे कामों को भी उसी से संबंधित बताया है और इस बात पर आग्रह करता है कि लोग, इस संबंध को, कि जो प्रकृतिक कारकों और अल्लाह के बीच होता है, समझें और उसे स्वीकार करें और हमेशा ही उस पर ध्यान दें।इस बात को और ज़्यादा स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण पेश किया जा सकता हैः मिसाल के तौर पर अगर किसी कंपनी का मालिक किसी कर्मचारी को कोई काम करने का आदेश देता है या कोई काम, किसी कर्मचारी द्वारा किया जाता है तो वास्तव में उसं कंपनी और उसके मालिक का काम समझा जाता है बल्कि बौद्धिक रूप से उस काम का आदेश देने वाला करने वाले से ज़्यादा ज़िम्मेदारी होता है।दो महत्वपूर्ण नतीजाअल्लाह के कामों में तौहीद के यक़ीन का नतीजा यह है कि इंसान, अल्लाह के अतिरिक्त किसी चीज़ या किसी इंसान को इबादत योग्य न समझे क्योंकि जैसा कि पहले बताया जा चुका है, इबादत योग्य वही होता है जो पैदा करने वाला और परवरदिगार हो दूसरे शब्दों में अल्लाह होने का मतलब परवरदिगार व पैदा करने वाला होना है।दूसरी ओर तौहीद के वर्णित मतलब का नतीजा यह है कि इंसान का पूरा भरोसा अल्लाह पर रहे और हर काम में केवल उसी पर भरोसा करे और केवल उसी से सहायता माँगे और उसके अतिरिक्त न तो किसी से डरे और न ही किसी से कोई उम्मीद रखे यहाँ तक कि अगर यह उसकी इच्छा पुर्ति के भौतिक कारक व हालात मौजूद न हों तब भी वह निराश न हो क्योंकि अल्लाह आसाधारण रास्तों से भी उसकी इच्छा पूरी कर सकता है।इस तरह का इंसान अल्लाह की विशेष कृपा का पात्र बनता है और उसके मन को अभूतपूर्ण शांति मिलती है जैसा कि क़ुर्आने मजीद में है कि जान लो अल्लाह के मित्रों को न डर है और न ही वह दुखी होते हैं।यह दो नतीजा क़ुर्आने मजीद के पहले सूरे की इस आयत में कि जिसे हर मुसलमान दिन में कम से कम पाँच बार दोहराता है, मौजूद हैःहम तेरी इबादत करते हैं और तुझ से ही सहायता चाहते हैं।एक शंका का निवारणयहाँ पर संभव है कि मन में यह शंका पैदा हो कि अगर तौहीद का मतलब यह है कि इंसान अल्लाह के अतिरिक्त किसी से भी सहायता न माँगे तो फिर अल्लाह के विशेष दासों से भी सहायता नहीं माँगी जा सकती।इस शंका का जवाब यह है कि अल्लाह के विशेष दासों से सहायता माँगना, अगर इस विचार के साथ हो कि वह लोग अल्लाह की अनुमति के बिना स्वाधीन रूप से माँगने वाले की इच्छापूर्ति कर सकते हैं तो इस तरह की सहायता माँगना, तौहीद के विपरीत होगा लेकिन अगर मन में यह विचार हो कि अल्लाह ने इन विशेष दासों को अपनी कृपा तक पह Via -  तौहीद क्या है?


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