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घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का एक मार्ग अज़ादारी है

कर्बला की घटना इतिहास की सीमित घटनाओं में से एक है और इतिहास की दूसरी घटनाओं में इसका एक विशेष स्थान है। यद्यपि कर्बला की घटना सन् ६१ हिजरी क़मरी की है परंतु १४ शताब्दियां बीत जाने के बावजूद इस घटना की ताज़गी आज भी है बल्कि वास्तविकता यह है कि इस घटना को बीते हुए जितना अधिक समय गुजर रहा है उतना ही वह विस्तृत होती जा रही है और उसके नये नये आयाम व प्रभाव सामने आते जा रहे हैं।
जब कर्बला की महान घटना हुई थी तब बनी उमय्या के शासकों ने इसकी वास्तविकताओं को बदलने की हर संभव चेष्टा की। उन्होंने सबसे पहला कार्य यह किया कि आशूरा के दिन खुशी मनाई और उसे अपनी विजय दिवस के रूप में मनाया परंतु जब उनके अत्याचारों एवं अपराधों से पर्दा उठ गया तो उन्होंने उसका औचित्य दर्शाने की भरपूर चेष्टा की। बनी उमय्या के शासकों के बाद के भी शासकों ने आशूरा की महान घटना को मिटाने का प्रयास किया। कभी उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के उद्देश्यों को परिवर्तित करने का प्रयास किया और कभी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अज़ादारों एवं श्रृद्धालुओं के लिए समस्याएं उत्पन्न कीं।


अब्बासी शासकों ने भी ७०० वर्षों तक कर्बला की महान घटना पर पर्दा डालने परिवर्तित करने का प्रयास किया। आज भी यह कार्य अत्याचार व अन्याय के प्रतीकों की ओर से जारी है परंतु इन समस्त प्रयासों के बावजूद आशूरा की घटना को न केवल मिटाया नहीं जा सका बल्कि दिन प्रतिदिन उसका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है और दिन प्रतिदिन अत्याचारियों का अस्ली चेहरा स्पष्ट होता जा रहा है। इस आधार पर प्रश्न यह उठता है कि आशूरा की घटना के बाक़ी रहने का रहस्य व संदेश क्या है? आखिर क्या कारण है कि इसे मिटाने और वास्तविकताओं को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किये जा रहे हैं फिर भी इसे न केवल मिटाया नहीं जा सका बल्कि दिन प्रतिदिन इस घटना का प्रकाश व प्रभाव फैलता ही जा रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आशूरा की घटना के बाकी रहने के विभिन्न कारण हैं परंतु चूंकि समय सीमित है इसलिए हम यहां पर उनमें से कुछ की ओर संकेत कर रहे हैं।
कर्बला की महान घटना के बाक़ी रहने का सबसे महत्वपूर्ण कारण महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की इच्छा है। महान ईश्वर सूरे सफ की आठवीं आयत में फरमाता है” ईश्वर के प्रकाश को अपने मुंह से बुझाना चाहते हैं किन्तु ईश्वर अपने प्रकाश को पूरा करके रहेगा यद्यपि यह कार्य काफिरों को पसंद नहीं है” चूंकि आशूरा की घटना में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी ईश्वरीय धर्म को बचाने और उसके प्रचार के लिए प्रयास कर रहे थे। इसलिए वे भी पवित्र कुरआन की इस आयत में शामिल हैं। अतः महान ईश्वर ने इरादा किया है कि न केवल वह अपने मार्गदर्शन के दीप को बुझने नहीं देगा बल्कि दिन प्रतिदिन उसे विस्तृत भी करेगा। अतः पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि निः संदेह हुसैन की शहादत से मोमिनों के दिलों में एक ऊष्मा उत्पन्न होगी जो कभी भी ठंडी नहीं होगी”
आशूरा की घटना के बाक़ी रहने का एक कारण इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और आशूरा के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है। पूरे इतिहास में मुसलमान और ग़ैर मुसलमान पैग़म्बरे इस्लाम के कथन को विशेष महत्व की दृष्टि से देखते थे। शीया- सुन्नी धर्मगुरूओं के फतवों के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम का अनुपालन वाजिब अर्थात अनिवार्य और उनकी अवज्ञा हराम है। क्योंकि महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन के सूरे निसा की आयत नंबर ८० में कहा है कि पैग़म्बर का आदेशा पालन अनिवार्य है। महान ईश्वर ने इसी प्रकार पवित्र कुरआन के सूरे शूरा की आयत नंबर २३ में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से प्रेम करने का आदेश दिया है। महान ईश्वर का यह आदेश न केवल समस्त इंसानों पर अनिवार्य है बल्कि स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने पवित्र परिजनों की दोस्ती को बयान और लोगों को उनकी दोस्ती के लाभों से परिचित कराया है। पैग़म्बरे इस्लाम के विशिष्ठ श्रृद्धालु व अनुयाई सलमान फारसी कहते हैं एक बार मैंने देखा कि इमाम हुसैन पैग़म्बरे इस्लाम की गोद में बैठे हैं और पैग़म्बरे इस्लाम ने उनके बारे में फरमाया” तुम मौला और सरदार हो, तुम सरदार के बेटे और सरदार के बाप हो, तुम इमाम, इमाम के बेटे और इमाम के बाप हो और तुम नौ इमामों के बाप हो और उनमें से नवां क़ायेम अर्थात अंतिम समय का  मुक्तिदाता होगा”
पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने जीवन में जगह जगह पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की विशेषता बयान की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की दुःखद घटना की खबर दी थी। सुन्नी मुसलमानों का प्रसिद्ध इतिहासकार और हदीस बयान करने वाला इब्ने असीर लिखता है कि असअस बिन सैहम अपने बाप के हवाले से बयान करता है कि उसने पैग़म्बरे इस्लाम से सुना है कि उन्होंने फरमाया है कि मेरा बेटा हुसैन इराक में शहीद किया जायेगा और जो भी उस समय मौजूद होगा उसे चाहिये कि हुसैन की सहायता करे” पैग़म्बरे इस्लाम की एक पत्नी आएशा के हवाले से भी बयान किया गया है कि एक दिन इमाम हुसैन को उस समय पैग़म्बर की सेवा में लाया गया जब वह छोटे थे पैग़म्बर ने उन्हें चूमा और फरमाया जो भी इसकी क़ब्र की ज़ियारत अर्थात दर्शन करने जाये उसे मेरे एक हज का पुण्य मिलेगा”
आशूरा की महान घटना के बाक़ी रहने का एक कारण पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन और उनके चाहने वालों द्वारा सदैव शोक सभाओं का आयोजन रहा है” इन शोक सभाओं में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के उद्देश्यों और वास्तविकताओं को बयान किया जाता है। इसी प्रकार इन शोक सभाओं में बनी उमय्या के अपराधों से पर्दा हटाया जाता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़ादारी में रोना और  उनके सदगुणों को बयान करना भी आशूरा के बाक़ी रहने का  महत्वपूर्ण कारण है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की प्राणप्रिय बहन हज़रत ज़ैनब ने आशूरा की महा घटना के बाद कूफा और शाम अर्थात वर्तमान सीरिया में जो साहसीपूर्ण भाषण दिये हैं वह भी आशूरा की घटना को बाक़ी रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हज़रत ज़ैनब ने अपने साहसी भाषणों से बनी उमय्या के चेहरे पर पड़ी नक़ाब को हटा दिया और लोगों को वास्तविकताओं से अवगत कर दिया। हज़रत ज़ैनब के साहसी भाषणों से बनी उमय्या की सरकार में भूचाल आ गया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्राणप्रिय सुपुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम भी आशूरा की हृदय विदारक घटना के बाद वर्षों रोते रहे। दूसरे शब्दों में इमाम ज़ैनुल आबदीन अलैहिस्सलाम के वर्षों रोने से बनी उमय्या के अपराधों व अत्याचारों की सीमा का अनुमान लगाया जा सकता है। इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम भी अपने सुपुत्र इमाम सादिक अलैहिस्सलाम के नाम वसीयत में फरमाते हैं” कि हज के मौसम में १० वर्षों तक मेना में अज़ादारी आयोजित करो और उसमें इमाम हुसैन तथा उनके साथियों की शहादत बयान की जाये। इसी कारण हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने भी अपनी विशेष परिस्थिति का लाभ उठाकर खलीफा अब्बासी के उत्तराधिकारी के काल में अज़ादारी आयोजित की।
आशूरा की घटना के बाक़ी रहने के बहुत से कारण हैं उनमें से एक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन की शैली और उसके उद्देश्य है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने मार्ग व उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए फरमाते हैं” मैंने अपने नाना की उम्मत में सुधार के लिए आंदोलन किया है और मैं भलाई का आदेश देना तथा बुराई से रोकना चाहता हूं। क्योंकि ईश्वर कुरआन में फरमाता है” और तुममें से एक गुट को होना चाहिये जो अच्छाई का आदेश दे और बुराई से रोके”
भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का एक मार्ग यह है कि अत्याचारी को भला कार्य अंजाम देने का आदेश दिया जाये और बुरा कार्य करने से मना किया जाये। अब अगर कोई सरकार धर्म के विरुद्ध हो और इस्लाम के मूल सिद्धांतों को खतरे में डाल दे तो समस्त संभावनाओं के साथ उसका मुकाबला किया जाना चाहिये। जब मोआविया का अत्याचारी पुत्र यज़ीद, जो भ्रष्टाचार में प्रसिद्ध था, मुसलमानों का शासक बना तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उसके मुकाबले में डट गये और उन्होंने उसकी बैअत नहीं की अर्थात उसका आदेशापालन स्वीकार नहीं किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने धार्मिक दायित्व का निर्वाह करते हुए लोगों से कहा” हे लोगों पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि तुममें से जो भी अत्याचारी शासक को देखे कि वह ईश्वर द्वारा हराम की गयी चीज़ को हलाल कर दिया हो और उसके वचनों को तोड़ा दिया हो, पैग़म्बरे इस्लाम की परम्परा का विरोध किया हो और ईश्वर के बंदों के मध्य पाप एवं अत्याचार कर रहा हो और उसके बाद लोग अपने कथन एवं कर्म से उसे परिवर्तित करने के लिए कुछ न करें तो ईश्वर को अधिकार है कि वह उस व्यक्ति को उसी स्थान में प्रविष्ट करे जहां अत्याचारी को प्रविष्ट किया है” इसी तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने आंदोलन को स्पष्ट करते हुए बयान फरमाते हैं” हे लोगों सावधान! इस कौम ने शैतान का अनुसरण किया है और उसने ईश्वर के अनुसरण को छोड़ दिया है और भ्रष्टाचार व बुराई को स्पष्ट कर दिया है और ईश्वरीय सीमाओं की अनदेखी कर दी है और बैतुलमाल को अर्थात राजकोष को व्यक्तिगत धन में परिवर्तित कर दिया है और ईश्वर के हराम को हलाल कर दिया है और ईश्वर के हलाल को हराम कर दिया है और मैं इस स्थिति को परिवर्तित करने के लिए सबसे योग्य व्यक्ति हूं”
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दूसरे स्थान पर मोमिन की प्रतिष्ठा पर बल देकर कहते हैं” जान लो उन लोगों ने मुझे दो चीज़ों के मध्य छोड़ दिया है तलवार और अपमान। अपमान मुझसे बहुत दूर है। ईश्वर, उसका पैग़म्बर और मोमिनीन इस प्रकार के कार्य से दूर हैं”
जब हम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वक्तव्य पर ध्यान देते हैं तो ज्ञात होता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वक्तव्य का अर्थ वह आकांक्षा है जो केवल उनके समय से विशेष नहीं थी और वह समस्त कालों व समस्त इंसानों के लिए उपयुक्त है। इस आधार पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का महाआंदोलन न केवल मुसलमानों के लिए बल्कि समस्त स्वतंत्रता प्रेमी इंसानों के लिए सर्वोत्तम आदर्श है।
वास्तव में आशूरा की घटना वह चीज़ है जिसने ईश्वरीय धर्म इस्लाम को जीवन प्रदान किया है। अलबत्ता उस समय के इस्लामी समाज में बनी उमय्या की सरकार ने लोगों को बड़ी सरलता से एसा बना दिया था कि वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से प्रेम करने का दावा करें और दूसरी ओर वे उन्हें शहीद करने के लिए भी तैयार हो जायें। वे इस्लाम के नाम पर नास्तिकता कर रहे थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन ने अज्ञानी व अनभिज्ञ लोगों के मार्ग को परिवर्तित कर दिया और समस्त लोग समझ गये कि समाज का सुधार सबकी ज़िम्मेदारी है और सभी लोगों को चाहिये कि वे अपनी संभावना व क्षमता के अनुसार इस कार्य के लिए प्रयास करें। स्वयं यह कार्य भी आशूरा की घटना के बाक़ी रहने का महत्वपूर्ण कारण है।
Via -http://hindi.irib.ir/component/k2/item/67250-%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A5%A8

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