Skip to main content

घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का एक मार्ग अज़ादारी है

कर्बला की घटना इतिहास की सीमित घटनाओं में से एक है और इतिहास की दूसरी घटनाओं में इसका एक विशेष स्थान है। यद्यपि कर्बला की घटना सन् ६१ हिजरी क़मरी की है परंतु १४ शताब्दियां बीत जाने के बावजूद इस घटना की ताज़गी आज भी है बल्कि वास्तविकता यह है कि इस घटना को बीते हुए जितना अधिक समय गुजर रहा है उतना ही वह विस्तृत होती जा रही है और उसके नये नये आयाम व प्रभाव सामने आते जा रहे हैं।
जब कर्बला की महान घटना हुई थी तब बनी उमय्या के शासकों ने इसकी वास्तविकताओं को बदलने की हर संभव चेष्टा की। उन्होंने सबसे पहला कार्य यह किया कि आशूरा के दिन खुशी मनाई और उसे अपनी विजय दिवस के रूप में मनाया परंतु जब उनके अत्याचारों एवं अपराधों से पर्दा उठ गया तो उन्होंने उसका औचित्य दर्शाने की भरपूर चेष्टा की। बनी उमय्या के शासकों के बाद के भी शासकों ने आशूरा की महान घटना को मिटाने का प्रयास किया। कभी उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के उद्देश्यों को परिवर्तित करने का प्रयास किया और कभी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अज़ादारों एवं श्रृद्धालुओं के लिए समस्याएं उत्पन्न कीं।


अब्बासी शासकों ने भी ७०० वर्षों तक कर्बला की महान घटना पर पर्दा डालने परिवर्तित करने का प्रयास किया। आज भी यह कार्य अत्याचार व अन्याय के प्रतीकों की ओर से जारी है परंतु इन समस्त प्रयासों के बावजूद आशूरा की घटना को न केवल मिटाया नहीं जा सका बल्कि दिन प्रतिदिन उसका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है और दिन प्रतिदिन अत्याचारियों का अस्ली चेहरा स्पष्ट होता जा रहा है। इस आधार पर प्रश्न यह उठता है कि आशूरा की घटना के बाक़ी रहने का रहस्य व संदेश क्या है? आखिर क्या कारण है कि इसे मिटाने और वास्तविकताओं को बदलने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किये जा रहे हैं फिर भी इसे न केवल मिटाया नहीं जा सका बल्कि दिन प्रतिदिन इस घटना का प्रकाश व प्रभाव फैलता ही जा रहा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आशूरा की घटना के बाकी रहने के विभिन्न कारण हैं परंतु चूंकि समय सीमित है इसलिए हम यहां पर उनमें से कुछ की ओर संकेत कर रहे हैं।
कर्बला की महान घटना के बाक़ी रहने का सबसे महत्वपूर्ण कारण महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की इच्छा है। महान ईश्वर सूरे सफ की आठवीं आयत में फरमाता है” ईश्वर के प्रकाश को अपने मुंह से बुझाना चाहते हैं किन्तु ईश्वर अपने प्रकाश को पूरा करके रहेगा यद्यपि यह कार्य काफिरों को पसंद नहीं है” चूंकि आशूरा की घटना में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी ईश्वरीय धर्म को बचाने और उसके प्रचार के लिए प्रयास कर रहे थे। इसलिए वे भी पवित्र कुरआन की इस आयत में शामिल हैं। अतः महान ईश्वर ने इरादा किया है कि न केवल वह अपने मार्गदर्शन के दीप को बुझने नहीं देगा बल्कि दिन प्रतिदिन उसे विस्तृत भी करेगा। अतः पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि निः संदेह हुसैन की शहादत से मोमिनों के दिलों में एक ऊष्मा उत्पन्न होगी जो कभी भी ठंडी नहीं होगी”
आशूरा की घटना के बाक़ी रहने का एक कारण इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और आशूरा के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का कथन है। पूरे इतिहास में मुसलमान और ग़ैर मुसलमान पैग़म्बरे इस्लाम के कथन को विशेष महत्व की दृष्टि से देखते थे। शीया- सुन्नी धर्मगुरूओं के फतवों के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम का अनुपालन वाजिब अर्थात अनिवार्य और उनकी अवज्ञा हराम है। क्योंकि महान ईश्वर ने पवित्र कुरआन के सूरे निसा की आयत नंबर ८० में कहा है कि पैग़म्बर का आदेशा पालन अनिवार्य है। महान ईश्वर ने इसी प्रकार पवित्र कुरआन के सूरे शूरा की आयत नंबर २३ में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से प्रेम करने का आदेश दिया है। महान ईश्वर का यह आदेश न केवल समस्त इंसानों पर अनिवार्य है बल्कि स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने पवित्र परिजनों की दोस्ती को बयान और लोगों को उनकी दोस्ती के लाभों से परिचित कराया है। पैग़म्बरे इस्लाम के विशिष्ठ श्रृद्धालु व अनुयाई सलमान फारसी कहते हैं एक बार मैंने देखा कि इमाम हुसैन पैग़म्बरे इस्लाम की गोद में बैठे हैं और पैग़म्बरे इस्लाम ने उनके बारे में फरमाया” तुम मौला और सरदार हो, तुम सरदार के बेटे और सरदार के बाप हो, तुम इमाम, इमाम के बेटे और इमाम के बाप हो और तुम नौ इमामों के बाप हो और उनमें से नवां क़ायेम अर्थात अंतिम समय का  मुक्तिदाता होगा”
पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने जीवन में जगह जगह पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की विशेषता बयान की और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की दुःखद घटना की खबर दी थी। सुन्नी मुसलमानों का प्रसिद्ध इतिहासकार और हदीस बयान करने वाला इब्ने असीर लिखता है कि असअस बिन सैहम अपने बाप के हवाले से बयान करता है कि उसने पैग़म्बरे इस्लाम से सुना है कि उन्होंने फरमाया है कि मेरा बेटा हुसैन इराक में शहीद किया जायेगा और जो भी उस समय मौजूद होगा उसे चाहिये कि हुसैन की सहायता करे” पैग़म्बरे इस्लाम की एक पत्नी आएशा के हवाले से भी बयान किया गया है कि एक दिन इमाम हुसैन को उस समय पैग़म्बर की सेवा में लाया गया जब वह छोटे थे पैग़म्बर ने उन्हें चूमा और फरमाया जो भी इसकी क़ब्र की ज़ियारत अर्थात दर्शन करने जाये उसे मेरे एक हज का पुण्य मिलेगा”
आशूरा की महान घटना के बाक़ी रहने का एक कारण पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन और उनके चाहने वालों द्वारा सदैव शोक सभाओं का आयोजन रहा है” इन शोक सभाओं में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन के उद्देश्यों और वास्तविकताओं को बयान किया जाता है। इसी प्रकार इन शोक सभाओं में बनी उमय्या के अपराधों से पर्दा हटाया जाता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की अज़ादारी में रोना और  उनके सदगुणों को बयान करना भी आशूरा के बाक़ी रहने का  महत्वपूर्ण कारण है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की प्राणप्रिय बहन हज़रत ज़ैनब ने आशूरा की महा घटना के बाद कूफा और शाम अर्थात वर्तमान सीरिया में जो साहसीपूर्ण भाषण दिये हैं वह भी आशूरा की घटना को बाक़ी रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हज़रत ज़ैनब ने अपने साहसी भाषणों से बनी उमय्या के चेहरे पर पड़ी नक़ाब को हटा दिया और लोगों को वास्तविकताओं से अवगत कर दिया। हज़रत ज़ैनब के साहसी भाषणों से बनी उमय्या की सरकार में भूचाल आ गया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्राणप्रिय सुपुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम भी आशूरा की हृदय विदारक घटना के बाद वर्षों रोते रहे। दूसरे शब्दों में इमाम ज़ैनुल आबदीन अलैहिस्सलाम के वर्षों रोने से बनी उमय्या के अपराधों व अत्याचारों की सीमा का अनुमान लगाया जा सकता है। इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम भी अपने सुपुत्र इमाम सादिक अलैहिस्सलाम के नाम वसीयत में फरमाते हैं” कि हज के मौसम में १० वर्षों तक मेना में अज़ादारी आयोजित करो और उसमें इमाम हुसैन तथा उनके साथियों की शहादत बयान की जाये। इसी कारण हज़रत इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम ने भी अपनी विशेष परिस्थिति का लाभ उठाकर खलीफा अब्बासी के उत्तराधिकारी के काल में अज़ादारी आयोजित की।
आशूरा की घटना के बाक़ी रहने के बहुत से कारण हैं उनमें से एक इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन की शैली और उसके उद्देश्य है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने मार्ग व उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए फरमाते हैं” मैंने अपने नाना की उम्मत में सुधार के लिए आंदोलन किया है और मैं भलाई का आदेश देना तथा बुराई से रोकना चाहता हूं। क्योंकि ईश्वर कुरआन में फरमाता है” और तुममें से एक गुट को होना चाहिये जो अच्छाई का आदेश दे और बुराई से रोके”
भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने का एक मार्ग यह है कि अत्याचारी को भला कार्य अंजाम देने का आदेश दिया जाये और बुरा कार्य करने से मना किया जाये। अब अगर कोई सरकार धर्म के विरुद्ध हो और इस्लाम के मूल सिद्धांतों को खतरे में डाल दे तो समस्त संभावनाओं के साथ उसका मुकाबला किया जाना चाहिये। जब मोआविया का अत्याचारी पुत्र यज़ीद, जो भ्रष्टाचार में प्रसिद्ध था, मुसलमानों का शासक बना तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उसके मुकाबले में डट गये और उन्होंने उसकी बैअत नहीं की अर्थात उसका आदेशापालन स्वीकार नहीं किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने धार्मिक दायित्व का निर्वाह करते हुए लोगों से कहा” हे लोगों पैग़म्बरे इस्लाम ने फरमाया है कि तुममें से जो भी अत्याचारी शासक को देखे कि वह ईश्वर द्वारा हराम की गयी चीज़ को हलाल कर दिया हो और उसके वचनों को तोड़ा दिया हो, पैग़म्बरे इस्लाम की परम्परा का विरोध किया हो और ईश्वर के बंदों के मध्य पाप एवं अत्याचार कर रहा हो और उसके बाद लोग अपने कथन एवं कर्म से उसे परिवर्तित करने के लिए कुछ न करें तो ईश्वर को अधिकार है कि वह उस व्यक्ति को उसी स्थान में प्रविष्ट करे जहां अत्याचारी को प्रविष्ट किया है” इसी तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने आंदोलन को स्पष्ट करते हुए बयान फरमाते हैं” हे लोगों सावधान! इस कौम ने शैतान का अनुसरण किया है और उसने ईश्वर के अनुसरण को छोड़ दिया है और भ्रष्टाचार व बुराई को स्पष्ट कर दिया है और ईश्वरीय सीमाओं की अनदेखी कर दी है और बैतुलमाल को अर्थात राजकोष को व्यक्तिगत धन में परिवर्तित कर दिया है और ईश्वर के हराम को हलाल कर दिया है और ईश्वर के हलाल को हराम कर दिया है और मैं इस स्थिति को परिवर्तित करने के लिए सबसे योग्य व्यक्ति हूं”
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दूसरे स्थान पर मोमिन की प्रतिष्ठा पर बल देकर कहते हैं” जान लो उन लोगों ने मुझे दो चीज़ों के मध्य छोड़ दिया है तलवार और अपमान। अपमान मुझसे बहुत दूर है। ईश्वर, उसका पैग़म्बर और मोमिनीन इस प्रकार के कार्य से दूर हैं”
जब हम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वक्तव्य पर ध्यान देते हैं तो ज्ञात होता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के वक्तव्य का अर्थ वह आकांक्षा है जो केवल उनके समय से विशेष नहीं थी और वह समस्त कालों व समस्त इंसानों के लिए उपयुक्त है। इस आधार पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का महाआंदोलन न केवल मुसलमानों के लिए बल्कि समस्त स्वतंत्रता प्रेमी इंसानों के लिए सर्वोत्तम आदर्श है।
वास्तव में आशूरा की घटना वह चीज़ है जिसने ईश्वरीय धर्म इस्लाम को जीवन प्रदान किया है। अलबत्ता उस समय के इस्लामी समाज में बनी उमय्या की सरकार ने लोगों को बड़ी सरलता से एसा बना दिया था कि वे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से प्रेम करने का दावा करें और दूसरी ओर वे उन्हें शहीद करने के लिए भी तैयार हो जायें। वे इस्लाम के नाम पर नास्तिकता कर रहे थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन ने अज्ञानी व अनभिज्ञ लोगों के मार्ग को परिवर्तित कर दिया और समस्त लोग समझ गये कि समाज का सुधार सबकी ज़िम्मेदारी है और सभी लोगों को चाहिये कि वे अपनी संभावना व क्षमता के अनुसार इस कार्य के लिए प्रयास करें। स्वयं यह कार्य भी आशूरा की घटना के बाक़ी रहने का महत्वपूर्ण कारण है।
Via -http://hindi.irib.ir/component/k2/item/67250-%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A5%A8

Comments

Popular posts from this blog

चुगली,ग़ीबत यानी पीठ पीछे बुराई करना। इस्लामी शिक्षाओं में बहुत ज़्यादा आलोचना की गयी है

ग़ीबत यानी पीठ पीछे बुराई करना है, ग़ीबत एक ऐसी बुराई है जो इंसान के मन मस्तिष्क को नुक़सान पहुंचाती है और सामाजिक संबंधों के लिए भी ज़हर होती है। पीठ पीछे बुराई करने की इस्लामी शिक्षाओं में बहुत ज़्यादा आलोचना की गयी है। पीठ पीछे बुराई की परिभाषा में कहा गया है पीठ पीछे बुराई करने का मतलब यह है कि किसी की अनुपस्थिति में उसकी बुराई किसी दूसरे इंसान से की जाए कुछ इस तरह से कि अगर वह इंसान ख़ुद सुने तो उसे दुख हो। पैगम्बरे इस्लाम स.अ ने पीठ पीछे बुराई करने की परिभाषा करते हुए कहा है कि पीठ पीछे बुराई करना यह है कि अपने भाई को इस तरह से याद करो जो उसे नापसन्द हो। लोगों ने पूछाः अगर कही गयी बुराई सचमुच उस इंसान में पाई जाती हो तो भी वह ग़ीबत है? तो पैगम्बरे इस्लाम ने फरमाया कि जो तुम उसके बारे में कह रहे हो अगर वह उसमें है तो यह ग़ीबत है और अगर वह बुराई उसमें न हो तो फिर तुमने उस पर आरोप लगाया है।यहां पर यह सवाल उठता है कि इंसान किसी की पीठ पीछे बुराई क्यों करता है?  पीठ पीछे बुराई के कई कारण हो सकते हैं। कभी जलन, पीठ पीछे बुराई का कारण बनती है। जबकि इंसान को किसी दूसरे की स्थिति से ...

म्यांमार: आंग सान सू ची की रोहिंग्या मुसलमानों पर दिए गए बयान से दुनिया भर में आलोचना

म्यांमार की नोबल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची की रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति पर दिए गए उनके बयान के लिए दुनिया भर में आलोचना हो रही है। ग़ौरतलब है कि रोहिंग्या मुसलमानों पर म्यांमार सेना के ताज़ा हमलों में हज़ारों लोग मारे जा चुके हैं और 3 लाख से अधिक लोगों ने अपना घरबार छोड़कर बांग्लादेश में शरण ली है। रोहिंग्या संकट पर चुप्पी साधने वाली म्यांमार की नेता सू ची ने पिछले हफ़्ते दावा किया था कि मीडिया में रोहिंग्या मुसलमानों के संकट के बारे में ग़लत रिपोर्टिंग हो रही है। उन्होंने कहा था कि हमारे देश में समस्त लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की जाती है। दुनिया भर में शांति का नोबल पुरस्कार हासिल करने वाली सू ची की इन बयानों को लेकर कड़ी निंदा की जा रही है और मांग की जा रही है कि उनसे शांति का नोबल पुरस्कार वापस लिया जाए। हालांकि दुनिया के सभी नेता आंग सान सू ची का आलोचना में एकमत नहीं हैं। उदाहरण स्वरूप भारतीय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल उनकी आलोचना करने से इनकार कर दिया, बल्कि उन्हें समर्थन का आश्वसन दिया है। msm  

फ्रांस में हो रहा है मुसलमानों पर अत्याचार देखें वीडियो वायरल।

 सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रही है जिसमें फ्रांस के पुरुष पुलिसकर्मियों के द्वारा एक मुस्लिम महिला के ऊपर अत्याचार करते हुए दिखाया जा रहा है   आप भी वीडियो देखें और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें कि किस प्रकार फ्रांस की हकूमत मुसलमानों के साथ अत्याचार कर रही है। नोट- हमे अभी तक इस बात की  पुष्टि नहीं हुई है कि यह वीडियो फ्रांस की है। मगर अगर यह फ्रांस की वीडियो है तो बहुत ही निंदिया है। ट्रंप की हार और जो बिडेन जीते।

बंगाल 24 परगना: हिंदू पड़ोसी की मदद के लिए पैसा बांट रहे मुस्लिम

दंगाग्रस्त बशीरहाट में उम्मीद की कोंपले फूट रही हैं. बांग्लादेश सीमा से लगे उत्तरी 24 परगना के इस इलाके में मुस्लिम लोग अपने हिंदू पड़ोसियों की मदद के लिए पैसा बांट रहे हैं. हफ्ते भर पहले हुई बशीरहाट हिंसा में सौ से ज्यादा दुकानें और मकान क्षतिग्रस्त हो गए. इनमें हिंदुओं की दुकानें और मकानों को काफी क्षति पहुंची है. ये हिंसा सोशल मीडिया पर वायरल हुई आपत्तिजनक पोस्ट के चलते हुई जिसमें इस्लाम और मुस्लिम के बारे में गलत टिप्पणी की गई थी. बशीरहाट की त्रिमुहानी का नजारा कुछ ऐसा है कि पुलिस और सुरक्षा बल के पहरे में खड़े मोहम्मद नूर इस्लाम गाजी और अजय पाल को भीड़ घेरे हुई है. यही पर अजय पाल की पान बीड़ी की दुकान है. मंगलवार को भड़की हिंसा में इस इलाके में खूब बवाल हुआ था. दुकानें लूट ली गई थीं और घरों में तोड़फोड़ हुई. गाजी और कई मुसलमान पाल से अपनी दुकान दोबारा खोलने की गुजारिश कर रहे हैं. साथ ही पाल से 2 हजार रुपये लेने की गुजारिश कर रहे हैं. स्थानीय बिजनेसमैन गाजी ने कहा, 'बाबरी विध्वंस के बाद भी हमारे शहर में शांति रही. मंगलवार को जो हुआ वो ठीक नहीं है. कुछ बाहरी लोग और हमारे स्थ...

एक बार फिर: मुस्लिम समाज बना फरिश्ता - मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसा

यूपी के मुजफ्फरनगर में खतौली के पास शनिवार को कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटना की शिकार हो गई। हादसे में 23 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है, जबकि 40 लोग घायल हुए हैं। भले ही कुछ मिट्ठी भर लोग मुस्लिम समाज को बुरी नज़र से देखते हो पर सत्य यह है के हमेशा देश को बनाने मानवता के लिए हमेशा से सब से आगे खड़ा मिलता है ऐसा ही कुछ  मुजफ्फरनगर ट्रेन हादसा में हुआ ।  नवभारतटाइम्स.कॉम के अनुसार हादसे का शिकार हुई उत्कल एक्सप्रेस के यात्रियों को स्थानीय लोगों की भरपूर मदद मिली। हादसे के बाद रेलवे की टीम के मौके पर पहुंचने से पहले ही स्थानीय लोग यात्रियों की मदद के लिए पहुंच गए थे और रेस्क्यू टीम के पहुंचने के बाद भी स्थानीय लोगों ने राहत और बचाव के काम में अपना सहयोग जारी रखा। लोगों ने यात्रियों को न सिर्फ बाहर निकालने में मदद की बल्कि उन्होंने खाना और जरूरत की अन्य चीजें भी यात्रियों को मुहैया कराईं। इमरान अली ने नाम के युवक ने कहा, 'स्थानीय लोगों ने हादसे के पीड़ित यात्रियों की मदद करने की पहल की और रात से ही हम उनकी मदद में जुटे हैं। हमने उन्हें खाना भी खिलाया। किसी ने हमें ...

Purpose OF Azadari- Moharram 2021

 

अज़ादारी ऐ इमाम हुसैन (अ स) के मकसद को समझे

विचार:रियाज़ अब्बास आब्दी   अज़ादारी सिर्फ इमाम हुसैन की याद में मजलिस व मातमदारी का नाम नहीं है बल्कि ज़ालिम तानाशाहों के ज़ुल्मों के खिलाफ आवाज़ उठाने का नाम भी अज़ादारी है  अल्लाह के लिए अपनी दुनियावी आरज़ूओं पर लगाम लगाने का नाम अज़ादारी है  एक दुसरे से किसी को तकलीफ न पहुंचे,किसी का दिल न दुखे यह अज़ादारी है  शहीदे कर्बला के किरदारों, कुर्बानियों, सबर को अपनी ज़िन्दगी में अमलीजामा पहनाने का नाम अज़ादारी है  अपने प्यार अपने किरदार से दुश्मन को भी अपना दोस्त बनाने पर मजबूर कर देने का नाम अज़ादारी है  भूके को खाना खिलाना, प्यासे की प्यास बुझाना, मजलूम का साथ देने का नाम अज़ादारी है   दुनियावी परेशानियों में घिरे होने के बाद भी अल्लाह को न भूलने का नाम अज़ादारी है किसी के हक को दिलाने और देने का नाम नाम अज़ादारी है  ओरतों की इज्ज़त और बच्चों को प्यार करने का नाम अज़ादारी है  दोस्ती निभाना, भाई का भाई के लिए कुर्बानी देने का नाम अज़ादारी है  हक के लिए अपनी जान,मालो दोलत गवाने का नाम अज़ादारी है  यतीमों, मिसकीनों, मुसाफिरों, ज...

घरों में कम होता खुलापन बना रहा बीमार - जरूरी बात

लंदन एजेंसियां :वायु प्रदूषण का खतरा सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं हैं। घरों में घटता खुलापन और आराम देने वाले आधुनिक उपकरणों से पनप रहा अंदरूनी प्रदूषण भी लोगों को बीमार कर रहा है। यह अंदरूनी प्रदूषण श्वसन रोग समेत फेफड़े की कई बीमारियों कारण बन रहा है। ब्रिटिश विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में यह चेतावनी दी है।   अंदरूनी प्रदूषण की अनदेखी : शोधकर्ताओं ने कहा, बाहर के वायु प्रदूषण के खतरों से हम सभी परिचित हैं। यह हर साल ब्रिटेन में 40 हजार और अमेरिका में दो लाख लोगों की असमय मौत का कारण बनता है। लेकिन ज्यादातर लोगों को इसका अंदाजा नहीं है कि छोटे घर के भीतर की प्रदूषित वायु भी स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। घरेलू उपकरणों का असर : उन्होंने कहा, आजकल ज्यादातर घरों में गैस-चूल्हों का इस्तेमाल किया जाता है। घरों की साफ-सफाई के लिए रासायनिक स्वच्छता उत्पादों का प्रयोग होता है। कमरों को गर्म या ठंडा रखने के लिए एयरकंडीशनर का इस्तेमाल भी आम है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ये सारी चीजें घर की अंदरूनी हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं, जिनका असर हमारे फेफड़ों पर पड़ता है। ...

عزاداری صرف ماتم داری کا نام نہیں ہے بلکہ انسانیت کے پرچم کو بلند کرنے کا نام عزاداری ہے - عظمت عابدی

  आजादारी सिर्फ मातम का नाम नहीं, इंसानियत का झंडा फहराना ही आजादारी है