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घबराओ नहीं[जरुर पढे]

युद्ध में हार या जीत का असली मानक हसन नसरुल्ला, हिज़्बुल्लाह के नेता, की शहादत ने एक नई बहस छेड़ दी है कि युद्ध में असली जीत और हार का क्या मानक है। उनकी शहादत एक बड़ा नुकसान है, लेकिन जिस सिद्धांत और उद्देश्य के लिए उन्होंने संघर्ष किया, वह आज भी जीवित है। उनका जीवन और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब किसी कौम के पास एक मजबूत सिद्धांत होता है, तो वह अपने अस्तित्व के लिए लड़ती रहती है। युद्धों का इतिहास हमें सिखाता है कि हार और जीत का निर्णय हमेशा युद्ध के मैदान में लड़ने वालों की संख्या या शहीदों की संख्या पर नहीं होता, बल्कि उस उद्देश्य की सफलता पर होता है जिसके लिए युद्ध लड़ा गया। यही उद्देश्य है जो जातियों को प्रेरित करता है और उन्हें लड़ने के कारण प्रदान करता है। जब भी कोई कौम युद्ध की शुरुआत करती है, वह एक स्पष्ट उद्देश्य से प्रेरित होती है। यह उद्देश्य कुछ भी हो सकता है: स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय, राष्ट्रीय सुरक्षा, या किसी सिद्धांत का संरक्षण। युद्ध में भाग लेने वाले लोग विश्वास करते हैं कि वे किसी बड़े कारण के लिए लड़ रहे हैं। यदि यह उद्देश्य पूरा होता है, तो इसे सफलता माना जाता ...

अज़ादारी आतंकवाद व अन्याय के खिलाफ एक मिशन

क्या आप महान व सर्वसमर्थ ईश्वर से प्रेम करने वाले व्यक्तियों को पहचानते हैं? ईश्वर से प्रेम करने वालों का हृदय उसके प्रेम में डूबा होता है।
वे लोगों की समस्याओं का समाधान करते हैं और वे हर उस कार्य के लिए कदम बढ़ाते हैं और प्रयास करते हैं जिसमें महान ईश्वर की प्रसन्नता होती है। वे महान ईश्वर के प्रेम में रातों को उपासना करते हैं, प्रार्थना करते हैं और पवित्र कुरआन की तिलावत करते हैं। वे दुनिया में रहते हैं कार्य व प्रयास करते हैं परंतु कभी भी वे दुनिया के क्षणिक आनंदों के धोखे में नहीं आते और पवित्र कुरआन के अनुसार ईश्वर के प्रेम में जीवन बिताने वाले व्यक्ति को व्यापार उसकी याद से निश्चेत नहीं कर सकते। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उन महान हस्तियों में से एक हैं जो ईश्वरीय प्रेम की प्रतिमूर्ति थे और पवित्र कुरआन के अस्तित्व से मिश्रित हो गये थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम, हज़रत अली और हज़रत फातेमा ज़हरा की गोद में पले बढ़े थे और बाल्याकाल से ही वह ईश्वरीय ग्रंथ पवित्र कुरआन से पूर्णरूप से परिचित थे। पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने प्रसिद्ध कथन में कहा है कि हमारे परिजन और कुरआन एक दूसरे से अलग नहीं होगें। उनका कथन है कि मैं तुम्हारे बीच दो मूल्यवान चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूं एक अपने परिजन और दूसरे ईश्वरीय किताब कुरआन और यह दोनों एक दूसरे से अलग नहीं होंगे यहां तक कि वे हौज़े कौसर पर एक साथ मेरे पास आयेंगे” जब पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों और पवित्र कुरआन के मध्य इस प्रकार का संबंध है तो स्पष्ट है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सदगुणों व ईश्वरीय विशेषताओं के स्वामी एवं प्रतिमूर्ति हैं।
क्योंकि जिस हस्ती को पैग़म्बरे इस्लाम ने पवित्र कुरआन का समतुल्य बताया है उसे प्रकार के अवगुणों से पवित्र होना चाहिये वरना पैग़म्बरे इस्लाम के प्रसिद्ध कथन पर प्रश्न चिन्ह लग जायेगा। दूसरे शब्दों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कुरआने नातिक़ यानी बोलने वाला कुरआन हैं और उनका सदाचरण पवित्र कुरआन की अमली व्याख्या है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का सदाचरण पवित्र कुरआन से इस प्रकार मिश्रित था कि उन्होंने कर्बला की तपती भूमि पर पवित्र कुरआन की आयतों की तिलावत करके यज़ीद की राक्षसी सेना को उसके परिणामों से अवगत कराया परंतु जब राक्षसी सेना पर उनकी नसीहतों का कुछ असर नहीं हुआ तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने यज़ीदी सेना से कहा तुम्हारे पेट हराम से भरे हुए हैं इसलिए मेरी नसीहतों का तुम पर कोई प्रभाव नहीं हो रहा है। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि अगर इंसान का पेट हराम से भरा होता है तो नसीहतें उस पर असर नहीं करती हैं और नसीहत करने वाला इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जैसी महान हस्ती ही क्यों न हो।

मोआविया के मर जाने के बाद जब धर्मभ्रष्ठ व अत्याचारी यज़ीद शासक बना तो पवित्र नगर मदीना के गवर्नर की ओर से यज़ीद की बैअत करने के लिए उन पर दबाव में वृद्धि हो गयी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस दबाव के जवाब में स्वयं को और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को पहचनवाया और उन्हें ज्ञान का स्रोत बताया और यज़ीद को धर्मभ्रष्ठ व्यक्ति बताया तथा उसके बाद पवित्र नगर मदीने के गवर्नर से कहा कि जब वह धर्मभ्रष्ठ व्यक्ति है तो किस प्रकार मैं उसकी बैअत कर सकता हूं?

पवित्र नगर मदीना के गवर्नर ने जब यज़ीद की बैअत के लिए आग्रह किया तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उसे कुरआन की ततहीर नाम से प्रसिद्ध आयत की तिलावत करके सुनाया जिसमें महान ईश्वर कहता है कि हमने अहले बैत को हर प्रकार की बुराई व गन्दगी से पवित्र रखा है जिस तरह से पवित्र रखने का हक़ है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर धर्मभ्रष्ठ शासक यज़ीद की बैअत के लिए जब दबाव बहुत बढ़ गया तो इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने निकट परिजनों के साथ पवित्र नगर मदीना से मक्का की ओर चले गये ताकि वहां पर हज कर सकें और काबे के पास खतरों से सुरक्षित रहें और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पवित्र कुरआन के सूरे क़सस की २१वीं आयत की बार बार तिलावत फरमाते थे कि हे हमारे पालनहार! अत्याचारी कौम से हमें मुक्ति प्रदान कर” यह आयत वह दुआ है जो हज़रत मूसा ने फिरऔन से मुक्ति पाने के लिए किया था। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जिन आयतों की तिलावत की वह इस बात की सूचक हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को जनाब मूसा की भांति केवल अत्याचारी शासक यज़ीद की ओर से खतरा था। इसी प्रकार इन आयतों की तिलावत इस बात की सूचक है कि मुसलमानों ने पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के साथ अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई।


इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, यज़ीद जैसे धर्मभ्रष्ठ व्यक्ति की न तो बैअत कर सकते थे और न ही इस्लामी शिक्षाओं की उपेक्षा के प्रति निश्चिन्त  रह सकते थे इसलिए उन्होंने लोगों को जागरुक बनाने का फैसला किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पवित्र नगर मक्का में दो पत्र लिखा एक बसरा के लोगों के नाम और दूसरा कूफा वासियों के लिए। इमाम हुसैन ने बसरा के लोगों को संबोधित करते हुए लिखा” बेशक पैग़म्बरे इस्लाम कुरआन के साथ तुम्हारे पास भेजे गये और मैं तुम्हें ईश्वर की किताब और पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा की ओर बुला रहा हूं क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम की सुन्नत व परम्परा को भुला दिया गया है और नई नई चीज़ों को धर्म में उत्पन्न कर दिया गया है। अगर हमारी बात सुनोगे तो हम सफलता व मुक्ति के मार्ग की ओर पथप्रदर्शन करेंगे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इसी प्रकार कूफा वासियों के नाम पत्र में लिखा” मार्गदर्शक नहीं है मगर यह कि जो ईश्वर की किताब का पालन करने के लिए आमंत्रित करे, न्याय लागू करे और सत्य व हक को समाज के संचालन का आधार बनाये और ईश्वर के सीधे मार्ग में स्वयं की रक्षा करे”

जी हां पवित्र कुरआन और सुन्नत की ओर लोगों का मार्गदर्शन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की ज़िम्मेदारी थी। कूफावासियों ने हज़ारों पत्र लिखकर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को बुलाया जिसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इराक की ओर रवाना हो गये लेकिन शत्रु की सेना ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को कर्बला पहुंचने से पहले उनका रास्ता रोक लिया। उस समय कूफावासियों ने न केवल अपने वचनों पर अमल नहीं किया बल्कि उसके विपरीत व्यवहार किया और बहुत से कूफावासी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शहीद करने के लिए उमर बिन साअद की सेना से जा मिले परंतु इमाम हुसैन अलैहिस्लाम का हृदय ईश्वरीय प्रेम से ओत प्रोत था और वह अच्छी तरह जानते थे कि सच्चा रास्ता वही है जिस पर वे अग्रसर हैं।

जब नवीं मोहर्रम की दोपहर को उमर बिन साद ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के खैमों पर हमले का आदेश दिया और सेना उनके ख़ैमों की तरफ बढने लगी तब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने प्राणप्रिय भाई जनाब अब्बास से कहा कि वह दुश्मन से जाकर कह दें कि एक रात का हमें अवसर दिया जाये ताकि हम नमाज़ पढें और कुरआन की तिलावत करें और ईश्वर से प्रार्थना करें। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आशूरा की रात को एक वाक्य कहा जो महान व सर्वसमर्थ ईश्वर के प्रति उनके अथाह प्रेम व निष्ठा को दर्शाता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहा कि ईश्वर अच्छी तरह जानता है कि मैं हमेशा नमाज़ पढ़ने, कुरआन की तिलावत करने, बहुत दुआ करने और उसकी बारगाह में प्रायश्चित करने को बहुत पसंद करता हूं”

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आशूरा की रात और दिन को लोगों के मार्गदर्शन के लिए विभिन्न आयतों की तिलावत फरमाई। आशूरा की रात को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पवित्र कुरआन की इस आयत की तिलावत की कि जो लोग काफिर हो गये हैं वे इस बात की कल्पना न करें कि अगर उन्हें अवसर दिया गया है तो उनके फायदे में है! हम उन्हें अवसर देते हैं ताकि वे अपने पापों में वृद्धि करें और उनके लिए अपमानित करने वाला दंड तैयार है। एसा नहीं है कि तुम जैसे हो ईश्वर ने मोमिनों को अपनी हाल पर छोड़ दिया है किन्तु यह कि पवित्र को अपवित्र से अलग करे”

इसी तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम आशूरा के दिन जब भी खुत्बा देते थे पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों का सहारा लेते थे ताकि दिग्भ्रमित लोगों व सैनिकों को उनकी ग़लती से अवगत करायें। आशूरा के दिन जब उमरे साअद की सेना के मोहम्मद बिन असअस नाम के एक व्यक्ति ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हे फातेमा के बेटे हुसैन! तुम्हारे अंदर पैग़म्बरे इस्लाम की कौन सी विशेषता व श्रेष्ठता है जो दूसरों में नहीं है? इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उसके उत्तर में सूरे आले इमरान की ३३वीं आयत की तिलावत की कि ईश्वर ने आदम, नूह, आले इब्राहीम और आले इमरान को विश्व वासियों पर श्रेष्ठता प्रदान की है” इस प्रकार उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मैं हज़रत इब्राहीम की योग्य संतान हूं और ईश्वर ने उन्हें दूसरों पर वरियता दी है।

जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने देखा कि शत्रु की सेना पर उनकी नसीहतों का कोई प्रभाव नहीं हो रहा है तो पवित्र कुरआन की इस आयत की तिलावत फरमाई” हे मेरी कौम! अगर मेरी नसीहतें तुम पर भारी हैं तो तुम जो कर सकते हो करो मैंने ईश्वर पर भरोसा किया है अपनी सोचों और अपने पूज्यों की शक्ति एकट्ठा करो उसके बाद तुम पर कोई चीज़ पोशीदा नहीं रहेगी अपने कार्यों के हर आयाम पर सोच लो उसके बाद मेरे जीवन को समाप्त कर दो और एक क्षण का भी मुझे अवसर मत देना!” क्रूर शत्रुओं ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों के साथ भी यही किया और उन्हें तथा उनके वफादार एवं निष्ठावान साथियों को तीन दिन का भूखा प्यासा कर्बला के मरूस्थल में शहीद कर दिया।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पवित्र कुरआन से बहुत प्रेम करते थे उनका यह प्रेम उनके भौतिक जीवन तक सीमित नहीं था बल्कि शहादत के बाद भी जारी था। सल्मा  बिन कुहैल कहती हैं” मैंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पवित्र सिर को देखा जो भाले पर इस आयत की तिलावत कर रहा था ईश्वर उनकी बुराई को तुमसे दूर करता है वह देखने व जानने वाला है” इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की नसीहतें, सदाचरण और कथन सबके सबका स्रोत पवित्र कुरआन है। इमाम हुसैन अलैहिस्लाम ने क्षण भर के लिए भी अपमान को स्वीकार नहीं किया और उनका महाआंदोलन प्रतिष्ठा और पवित्र कुरआन पर चलने का सर्वोत्तम उदाहरण है।  

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